बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथचन्द्रदशायां भौमान्तरदशाफलम् - चन्द्रस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । सौभाग्यं राजसन्मानं वस्त्राभरणभूषणम् ॥९६॥ चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये भौम के अन्तुर में सौभाग्य, राजा से सम्मान, वस्त्र, आभूषण का लाभ ॥९६॥ यत्नात्कार्यार्थसंसिद्धिः भविष्यति न संशयः । गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च व्यवहारे जयोभवेत् ॥९७॥ प्रयत्न से कार्य और धन का लाभ होता है। गृह, खेत की वृद्धि, व्यवहार में विजय ॥९७॥ कार्यलाभं महत्सौख्यं स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे फलम् । षष्ठाष्टमव्यये भौमे पापयुक्तेऽथवा यदि ॥९८॥ कार्य में लाभ, बड़ा सुख होता है यदि भौम अपने उच्च वा अपनी राशि में हो भौम ६।८।१२ भाव में पापग्रह से ॥९८॥ दायेशादशुभस्थाने देहार्तिः शत्रुवीक्षिते । गृहक्षेत्रादिहानिश्च व्यवहारे तथैव च ॥९९॥ अथवा दशेश से अशुभ स्थान में हो शत्रु से देखा जाता हो तो शरीर में पीड़ा, गृह, खेती आदि की हानि, व्यवहार में भी हानि ॥९९॥ भृत्यवर्गेषु कलहं भूपालस्य विरोधनम् । आत्मवन्धुवियोगं च नित्यं निष्ठुरभाषणम् ॥१००॥ नौकरों से कलह, राजा से विरोध, अपने कुटुम्बियों से विक्षोभ और नित्य निष्ठुर वचन सुनने को मिलता है ॥१००॥ द्वितीयद्यूननाथेतु रन्ध्रे रन्ध्राधिपोयदा । तद्दोष परिहारार्थं ब्राह्मणस्यार्चनं चरेत् ॥१०१॥ यदि २।१२ भावों का स्वामी हो और अष्टमेश में हो तो इस दोष की शान्ति के लिये ब्राह्मण का पूजन करना चाहिये ॥१०१॥ अथचन्द्रदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् - चन्द्रस्यान्तर्गते राहौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । आदौ स्वल्पफलं ज्ञेयं शत्रुपीडा महद्भयम् ॥१०२॥ चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में गये हुये राहु के अन्तर में