बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६३ पहले अल्पफल होता है, शत्रुपीड़ा, भय, चौर, सर्प और राजभय होता है॥१०२॥ चौराहिराजभीतिश्च चतुष्पाज्जीवपीडनम् । बन्धुनाशं मित्रहानिं मानहानिं मनोव्यथाम् ॥१०३॥ चौपायों को कष्ट, बन्धुओं की हानि मित्र की हानि, मानहानि और मन में कष्ट होता है॥१०३॥ शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नादुपचयेऽपि वा । योगकारकसम्वन्धे इष्टकार्यार्थसिद्धिदम् ॥१०४॥ राहु शुभग्रह से युक्त शुभग्रह से दृष्ट हो और लग्न से ३।६।१०।११ भाव में हो योगकारक से सम्बन्ध करता हो तो अभीष्ट कार्य और धन का लाभ होता है॥१०४॥ नैर्ऋत्ये पश्चिमेभागे क्वचित्प्रभुसमागमः । वाहनाम्बरलाभं च इष्टकार्यार्थसिद्धिकृत् ॥१०५॥ नैर्ऋत्य वा पश्चिम दिशा में किसी श्रेष्ठ से समागम, वाहन, वस्त्र का लाभ, इष्टसिद्धि होती है॥१०५॥ दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते । स्थानभ्रष्टं मनोदुःखं पुत्रक्लेशं महद्भयम् ॥१०६॥ दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो तो स्थानभ्रष्ट, मन में दुःख, पुत्र- को कष्ट, भय॥१०६॥ राजकार्यप्रलापं च दारपीडा महद्भयम् । वृश्चिकादिविषाद्भीतिश्चौराहिनृपपीडनम् ॥१०७॥ राजकार्य में प्रलाप, स्त्री को कष्ट, महाभय, बिच्छू आदि के विष का भय, चौर, सर्प, राजा से पीड़ा होती है॥१०७॥ दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा । पुण्यतीर्थकलावाप्तिर्देवतादर्शनं महत् ॥१०८॥ दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा ३।११ भाव में राहु हो तो पुण्यतीर्थ कला का लाभ, देवता का दर्शन होता है धर्म आदि के संग्रह होते हैं॥१०८॥ परोपकारकर्मादि पुण्यधर्मादिसंग्रहः । द्वितीयद्यूनराशिस्थे देहबाधा भविष्यति । छागदानं प्रकुर्वीत देहारोग्यं प्रजायते ॥१०९॥