बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । २ वा ७ भाव में हो तो शरीर को कष्ट होता है। इससे शान्ति के लिये बकरी का दान करना चाहिये ॥१०९॥ अथचन्द्रदशायां गुर्वन्तर्दशाफलम् – चन्द्रस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वगेहे लाभस्वोच्चे वा राज्यलाभं महोत्सवम् ॥११०॥ चन्द्र की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये स्वगृह, लाभं स्थान वा अपने उच्च में गये हुये गुरु के अन्तर में राज्य का लाभ, बड़ा उत्सव ॥११०॥ वस्त्रालङ्कारभूषादि राजप्रीतिं धनागमम् । इष्टदेवप्रसादेन गर्भाधानादिकं फलम् ॥१११॥ वस्त्र, आभूषण, राज्य प्राप्ति, राजा की प्रसन्नता से धन का लाभ, इष्टदेव की प्रसन्नता से गर्भाधानादि फल होते हैं ॥१११॥ शुभशोभनकार्याणि गृहेलक्ष्मीकटाक्षकृत् । राजाश्रयं धनं भूमिगजवाजिसमन्वितम् ॥११२॥ और राजा की प्रसन्नता से सुखकर इष्टसिद्धि होती है। शुभ शोभन कर्म, लक्ष्मी का लाभ, राजा के आश्रय से धन भूमि आदि का लाभ ॥११२॥ महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा । षष्ठाष्टमव्ययेजीवे नीचे वास्तंगते यदि ॥११३॥ ६।८।१२ भाव में गुरु हों वा नीचे राशि में वा अस्त हों वा पापयुक्त हों तो ॥११३॥ पापयुक्तेऽशुभं कर्म गुरुपुत्रादिनाशनम् । स्थानभ्रंशं मनोदुःखमकस्मात्कलहं ध्रुवम् ॥११४॥ अशुभ कार्य माता पिता पुत्र का नाश स्थान की हानि मन को दुःख अकस्मात् कलह होता है ॥११४॥ गृहक्षेत्रादिनाशं च वाहनाम्बरनाशनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ॥११५॥ गृह-भूमि की हानि, वाहन की हानि होती है। दशेश से ६।८।१२ वें में हों निर्बल हों तो ॥११५॥ करोति कुत्सितान्नं च विदेशगमनं तथा । भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तमन्ते क्लेशकरं भवेत् ॥११६॥