बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६५ खराब अन्न का भोजन, विदेश-यात्रा होती है, अन्तर के आदि में शुभफल और अन्त में कष्ट कारक होता है।।११६।। द्वितीयद्यूननाथे च ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।।११७।। दूसरे वा सप्तम का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष की शान्ति के लिये शिव सहस्र नाम का जप।।११७।। स्वर्णदानमिति प्रोक्तं सर्वसम्पत्प्रदायकम् । दायेशात्केन्द्र कोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ।।११८।। सुवर्ण का दान करने से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे या लाभ स्थान में हों तो।।११८।। भोजनाम्बरपश्वादि महोत्साहं करोति च । भ्रात्रादिसुखसम्पत्तिर्धैर्यं वीर्यपराक्रमम् ।।११९।। भोजन, वस्त्र आदि का लाभ बड़ा उत्सव होता है। भाई आदि से सुख, सम्पत्ति, धैर्य, बल और पराक्रम में वृद्धि।।११९।। यज्ञदीक्षा विवाहश्च राज्यश्रीधनसम्पदः । चन्द्रस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।।१२०।। यज्ञ, दीक्षा, विवाह, राज्य, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति होती है चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये।।१२०।। अथचन्द्रदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् – स्वक्षेत्रेवा स्वांशगे चैव मन्दे तुङ्गांशगेऽथवा । शुभदृष्टियुते वापि लाभे वा बलसंयुते ।।१२१।। अपनी राशि वा अपने नवांश वा अपने उच्चांश में गये हुये शुभग्रह से दृष्ट वा युत ११ भाव में बलवान शनि के अन्तर में।।१२१।। पुत्रमित्रार्थसम्पत्तिः शूद्रप्रभुसमागमम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् ।।१२२।। पुत्र मित्र धन सम्पत्ति का लाभ, शूद्रवर्ण के राजा से संगति, व्यवसाय से लाभ, गृह, भूमि का लाभ।।१२२।। पुत्रलाभं च कल्याणं राजानुग्रह वैभवम् । षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वा धनगेऽपि वा ।।१२३।।