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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६३ पहले अल्पफल होता है, शत्रुपीड़ा, भय, चौर, सर्प और राजभय होता है॥१०२॥ चौराहिराजभीतिश्च चतुष्पाज्जीवपीडनम् । बन्धुनाशं मित्रहानिं मानहानिं मनोव्यथाम् ॥१०३॥ चौपायों को कष्ट, बन्धुओं की हानि मित्र की हानि, मानहानि और मन में कष्ट होता है॥१०३॥ शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नादुपचयेऽपि वा । योगकारकसम्वन्धे इष्टकार्यार्थसिद्धिदम् ॥१०४॥ राहु शुभग्रह से युक्त शुभग्रह से दृष्ट हो और लग्न से ३।६।१०।११ भाव में हो योगकारक से सम्बन्ध करता हो तो अभीष्ट कार्य और धन का लाभ होता है॥१०४॥ नैर्ऋत्ये पश्चिमेभागे क्वचित्प्रभुसमागमः । वाहनाम्बरलाभं च इष्टकार्यार्थसिद्धिकृत् ॥१०५॥ नैर्ऋत्य वा पश्चिम दिशा में किसी श्रेष्ठ से समागम, वाहन, वस्त्र का लाभ, इष्टसिद्धि होती है॥१०५॥ दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते । स्थानभ्रष्टं मनोदुःखं पुत्रक्लेशं महद्भयम् ॥१०६॥ दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो तो स्थानभ्रष्ट, मन में दुःख, पुत्र- को कष्ट, भय॥१०६॥ राजकार्यप्रलापं च दारपीडा महद्भयम् । वृश्चिकादिविषाद्भीतिश्चौराहिनृपपीडनम् ॥१०७॥ राजकार्य में प्रलाप, स्त्री को कष्ट, महाभय, बिच्छू आदि के विष का भय, चौर, सर्प, राजा से पीड़ा होती है॥१०७॥ दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा । पुण्यतीर्थकलावाप्तिर्देवतादर्शनं महत् ॥१०८॥ दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा ३।११ भाव में राहु हो तो पुण्यतीर्थ कला का लाभ, देवता का दर्शन होता है धर्म आदि के संग्रह होते हैं॥१०८॥ परोपकारकर्मादि पुण्यधर्मादिसंग्रहः । द्वितीयद्यूनराशिस्थे देहबाधा भविष्यति । छागदानं प्रकुर्वीत देहारोग्यं प्रजायते ॥१०९॥

४६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । २ वा ७ भाव में हो तो शरीर को कष्ट होता है। इससे शान्ति के लिये बकरी का दान करना चाहिये ॥१०९॥ अथचन्द्रदशायां गुर्वन्तर्दशाफलम् – चन्द्रस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वगेहे लाभस्वोच्चे वा राज्यलाभं महोत्सवम् ॥११०॥ चन्द्र की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये स्वगृह, लाभं स्थान वा अपने उच्च में गये हुये गुरु के अन्तर में राज्य का लाभ, बड़ा उत्सव ॥११०॥ वस्त्रालङ्कारभूषादि राजप्रीतिं धनागमम् । इष्टदेवप्रसादेन गर्भाधानादिकं फलम् ॥१११॥ वस्त्र, आभूषण, राज्य प्राप्ति, राजा की प्रसन्नता से धन का लाभ, इष्टदेव की प्रसन्नता से गर्भाधानादि फल होते हैं ॥१११॥ शुभशोभनकार्याणि गृहेलक्ष्मीकटाक्षकृत् । राजाश्रयं धनं भूमिगजवाजिसमन्वितम् ॥११२॥ और राजा की प्रसन्नता से सुखकर इष्टसिद्धि होती है। शुभ शोभन कर्म, लक्ष्मी का लाभ, राजा के आश्रय से धन भूमि आदि का लाभ ॥११२॥ महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा । षष्ठाष्टमव्ययेजीवे नीचे वास्तंगते यदि ॥११३॥ ६।८।१२ भाव में गुरु हों वा नीचे राशि में वा अस्त हों वा पापयुक्त हों तो ॥११३॥ पापयुक्तेऽशुभं कर्म गुरुपुत्रादिनाशनम् । स्थानभ्रंशं मनोदुःखमकस्मात्कलहं ध्रुवम् ॥११४॥ अशुभ कार्य माता पिता पुत्र का नाश स्थान की हानि मन को दुःख अकस्मात् कलह होता है ॥११४॥ गृहक्षेत्रादिनाशं च वाहनाम्बरनाशनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ॥११५॥ गृह-भूमि की हानि, वाहन की हानि होती है। दशेश से ६।८।१२ वें में हों निर्बल हों तो ॥११५॥ करोति कुत्सितान्नं च विदेशगमनं तथा । भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तमन्ते क्लेशकरं भवेत् ॥११६॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६५ खराब अन्न का भोजन, विदेश-यात्रा होती है, अन्तर के आदि में शुभफल और अन्त में कष्ट कारक होता है।।११६।। द्वितीयद्यूननाथे च ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।।११७।। दूसरे वा सप्तम का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष की शान्ति के लिये शिव सहस्र नाम का जप।।११७।। स्वर्णदानमिति प्रोक्तं सर्वसम्पत्प्रदायकम् । दायेशात्केन्द्र कोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ।।११८।। सुवर्ण का दान करने से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे या लाभ स्थान में हों तो।।११८।। भोजनाम्बरपश्वादि महोत्साहं करोति च । भ्रात्रादिसुखसम्पत्तिर्धैर्यं वीर्यपराक्रमम् ।।११९।। भोजन, वस्त्र आदि का लाभ बड़ा उत्सव होता है। भाई आदि से सुख, सम्पत्ति, धैर्य, बल और पराक्रम में वृद्धि।।११९।। यज्ञदीक्षा विवाहश्च राज्यश्रीधनसम्पदः । चन्द्रस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।।१२०।। यज्ञ, दीक्षा, विवाह, राज्य, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति होती है चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये।।१२०।। अथचन्द्रदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् – स्वक्षेत्रेवा स्वांशगे चैव मन्दे तुङ्गांशगेऽथवा । शुभदृष्टियुते वापि लाभे वा बलसंयुते ।।१२१।। अपनी राशि वा अपने नवांश वा अपने उच्चांश में गये हुये शुभग्रह से दृष्ट वा युत ११ भाव में बलवान शनि के अन्तर में।।१२१।। पुत्रमित्रार्थसम्पत्तिः शूद्रप्रभुसमागमम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् ।।१२२।। पुत्र मित्र धन सम्पत्ति का लाभ, शूद्रवर्ण के राजा से संगति, व्यवसाय से लाभ, गृह, भूमि का लाभ।।१२२।। पुत्रलाभं च कल्याणं राजानुग्रह वैभवम् । षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वा धनगेऽपि वा ।।१२३।।

४६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पुत्र का लाभ कल्याण तथा राजा के अनुग्रह से वैभव का लाभ होता है ६।८।१२ स्थान में अपनी नीच राशि वा २ रे भाव में शनि हो तो।।१२३।। तद्वृत्त्यादौ पुण्यतीर्थे स्नानं चैव तु दर्शनम् । अनेकजनत्रासश्च शस्त्रपीडा भविष्यति ।।१२४।। उसके अन्तर के आरम्भ में पुण्यतीर्थ का स्नान और दर्शन होता है। अनेक लोगों का भय तथा हथियार से पीड़ा होती है।।१२४।। दायेशात्केन्द्रराशिस्ये त्रिकोण वलगेऽपि वा । क्वचित्सौख्यं धनाप्तिश्चदारपुत्रविरोधकृत् ।।१२५।। दशेश से केन्द्र या त्रिकोण में बली हो तो कभी सुख धन का लाभ, स्त्री पुत्रादि से विरोध होता है।।१२५।। द्वितीयद्यूनरन्ध्रस्थे देहबाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजयजपं चरेत् । कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ।।१२६।। २।७।८ भाव में हो तो देह में रोगादि का भय होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ मृत्युंजय का जप, काली गौ, भैंस का दान करने से आरोग्यता होती है।।१२६।। अथचन्द्रदशायांबुधान्तर्दशाफलम् - चन्द्रस्थान्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वर्क्षे नवांशके सौम्ये तुङ्गे वा बलसंयुते ।।१२७।। चन्द्रमा की दशा में अपनी राशि, वा अपने नवांश वा अपनी उच्चराशि में बलवान्। बुध केन्द्र वा त्रिकोण में हो तो उसके अन्तर में।।१२७।। धनागमं राजमानं प्रियवस्त्रादिलाभकृत् । विद्याविनोदसङ्गोष्ठी ज्ञानवृद्धिः सुखावहा ।।१२८।। धन का आगमन, राज्यलाभ, प्रियवस्त्रों का लाभ होता है। विद्या विनोद, अच्छी सभा, ज्ञान में वृद्धि, सुख।।१२८।। सन्तानप्राप्ति सन्तोषं वाणिज्याद्धनलाभकृत् । वाहनच्छत्रसंयुक्तं नानालंकारभूषितम् ।।१२९।। सन्तान का लाभ, सन्तोष, व्यापार से धन का लाभ, वाहन, छत्र से युक्त अनेक आभूषणों का लाभ होता है।।१२९।।

अथान्तर्दशाफलविचारोध्यायः । ४६७ दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा । विवाहं यज्ञदीक्षां च दानधर्मशुभादिकम् ।।१३०।। दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ स्थान में वा धन स्थान में बुध हो तो विवाह यज्ञ, दीक्षा, दान, धर्म आदि शुभकार्य ।।१३०।। राजप्रीतिकरं चैव विद्वज्जन समागमम् । मुक्तामणिप्रवालानि वाहनाम्बरभूषणम् ।।१३१।। राजा से प्रेम, विद्वानों का समागम, मुक्ता, मणि, मूंगा, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है।।१३१।। आरोग्यप्रीतिसौख्यं च सोमपानादिकं सुखम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा नीचगेऽपि वा ।।१३२।। आरोग्यता, प्रसन्नता, सुख और सोमपान आदि का लाभ होता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में वा अपनी नीच राशि में बुध हो तो।।१३२।। तद्भुक्तौ देहबाधा च कृषिगोभूमिनाशनम् । कारागृहप्रवेशं च दारपुत्रादि पीडनम् ।।१३३।। उसके अन्तर में शरीर में बाधा, कृषि, गौ, भूमि का नाश जेल यात्रा, स्त्री पुत्र आदि को कष्ट होता है।।१३३।। द्वितीयद्यूननाथे च ज्वरपीडां महद्भयम् । छागदानं प्रकुर्वीत विष्णुसाहस्त्रकं जपेत् ।।१३४।। २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो ज्वर से पीड़ा और बड़ा भय होता है। शान्त्यर्थ बकरी का दान और विष्णु सहस्त्र नाम का जप कराना चाहिये।।१३४।। अथचन्द्रदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्- चन्द्रस्यान्तर्गते केतौ केन्द्रलाभ त्रिकोणगे । दुश्चिक्ये बलसंयुक्ते धनलाभं महत्सुखम् ।।१३५।। चन्द्रमा की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण में वा ३ रे भाव में बलवान् केतु के अन्तर में धन का लाभ, बड़ा सुख होता है।।१३५।। पुत्रदारादि सौख्यं च मित्रकर्म करोति च । भुक्त्यादौ धनहानिः स्यान्मध्यगे सुखमाप्नुयात् ।।१३६।। पुत्र, स्त्री को सुख, मित्रों के कार्य को करता है। अन्तर के आरम्भ में धन की हानि और मध्य में सुख होता है।।१३६।।

४६८- \qquad बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दायेशात्केन्द्रलाभे वा त्रिकोणे बलसंयुते । क्वचित्फलं दशादौ तु दारसौख्यंसुखावहम् ।।१३७।। दशेश से केन्द्र या एकादश वा त्रिकोण में बलवान् हो तो कभी दशा के आरंभ में ही स्त्री को सुख आदि शुभ फल होते हैं।।१३७।। गोमहिष्यादिलाभं च भुक्त्यन्ते चाथनाशनम् । पापयुक्तेऽथवा दृष्टे दायेशाद्रन्ध्ररिष्फगे ।।१३८।। गौ भैंस आदि का लाभ तथा दशा के अन्त में धन की हानि होती है। पापग्रह से युक्त वा दृष्ट हो और दशेश से २ या १२ भाव में हो तो।।१३८।। हीनशत्रुत्वकार्याणि अकस्मात्कलहं ध्रुवम् । द्वितीयद्यूनराशिस्थे अनारोग्यं महद्भयम् । मृत्युञ्जयजपं प्रकुवीते सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।१३९।। हीन कार्य शत्रुता करने वाले कार्य को करता है और अकस्मात् झगड़ा होता है। २ रे ये ७ वें भाव में हो तो कष्ट और बड़ा भय होता है। मृत्युंजय का जप कराने से सब प्रकार के सुख का अनुभव होता है।।१३९।। चन्द्रस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि राज्यलाभं करोति च ।।१४०।। यदि चन्द्रमा की दशा में केन्द्र या त्रिकोण वा अपने उच्चराशि अपने राशि में गये हुये शुक्र का अन्तर हो तो राज्यलाभ होता है।।१४०।। महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् । चतुष्पाज्जीवलाभं स्याद्दारपुत्रादिवर्धनम् ।।१४१।। नूतनागारनिर्माणं नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । सुगन्धपुष्पदायादिरम्यस्त्र्यारोग्यसम्पदाम् ।।१४२।। महाराजा की प्रसन्नता से वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ, चतुष्पद जीव का लाभ, स्त्री पुत्रादि की वृद्धि। नूतन मकान का निर्माण होता है, नित्य मिठाई खाने को प्राप्त होती है। सुगन्धित पुष्प, दायाद, सुन्दर स्त्री, आरोग्यता और सम्पत्ति का लाभ होता है।।१४२।। दशाधिपेन संयुक्ते देहसौख्यं महत्सुखम् । सत्कीर्त्तिर्मुखसम्पत्तिर्गृहक्षेत्रादि वृद्धिकृत् ।।१४३।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६९ दशेश के साथ शुक्र हो तो देह का सुख, बड़ा हर्ष, अच्छी कीर्त्ति, सुखं सम्पत्ति का लाभ, गृह, भूमि की वृद्धि होती है।।१४३।। धनस्थानगते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते । निधिलाभं महत्सौख्यं भूलाभं पुत्रसम्भवम् ।।१४४।। यदि शुक्र धन स्थान में अपनी उच्चराशि वा अपनी राशि में हो तो निधि (गड़ा धन) का लाभ, सुख, भूमि का लाभ, पुत्र का लाभ होता है।।१४४।। भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते भाग्यवृद्धिकरो भवेत् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहः ।।१४५।। यदि भाग्येश वा लाभेश से युक्त हो तो भाग्य की वृद्धि करता है महाराज की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि होती है।।१४५।। देवब्राह्मणभक्तिश्च मुक्ताविद्रुमलाभकृत् । दायेशाल्लाभगे शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपिवा ।।१४६।। देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है। मोती-मूंगा का लाभ होता है। दशेश से लाभ स्थान में शुक्र हो वा त्रिकोण वा केन्द्र में हो तो।।१४६।। गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च वित्तलाभं महत्सुखम् । नीचेवास्तंगते शुक्रे पापग्रहयुतेक्षिते ।।१४७।। गृह-भूमि में वृद्धि, धन का लाभ और सुख होता है। यदि शुक्र अपनी नीची राशि वा अस्त हो, पापग्रह से युत वा दृष्ट हो।।१४७।। भूनाशं पुत्रमित्रादिनाशनं पत्निनाशनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थेव्यये वा पापसंयुते ।।१४८।। तो भूमि का नाश, पुत्र मित्र आदि का नाश और स्त्री का नाश होता है। दशेश से ६।८।१२ वें पापग्रह से युत हो तो।।१४८।। विदेशवास दुःखार्ति मृत्युचौरादिपीडनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युभयं भवेत् ।।१४९।। विदेश में वास, दुःख, पीड़ा, मृत्यु, चौरादि से पीड़ा होती है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है।।१४९।। तद्दोषोपशान्त्यर्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् । श्वेतां गां रजतं दद्याच्छान्तिं प्राप्नोत्यसंशयः ।।१५०।। इस दोष के शान्त्यर्थ रुद्र जप, सफेद गौ, चाँदी का दान करने से निश्चय ही शान्ति प्राप्त होती है।।१५०।।

४७० वृहतत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ चन्द्रदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्- चन्द्रस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा धने वा सोदरे बले ।।१५१।। चन्द्रमा की दशा में अपने उच्च या अपने राशि में गये हुये केन्द्र या त्रिकोण या लाभ में वा धन वा तीसरे भाव में बैठे हुये बली सूर्य के अन्तर में ।।१५१।। नष्टराज्य धनप्राप्तिं गृहे कल्याण शोभनम् । मित्रराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।।१५२।। नष्ट हुये राज्य और धन का लाभ, गृह में कल्याण का अनुभव होता है तथा मित्र और राजा की प्रसन्नता से ग्राम भूमि आदि का लाभ ।।१५२।। गर्भाधानकलत्राप्तिर्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् । भुक्त्यन्ते देहजाड्यत्वं ज्वरपीडा भविष्यति ।।१५३।। स्त्री की प्राप्ति और गर्भ की संभावना होती है; गृह में लक्ष्मी का वास होता है। दशा के अन्त में शरीर में जड़ता और ज्वर से पीड़ा होती है।।१५३।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्ययेवा पापसंयुते । नृपचौराग्निभीतिश्च ज्वररोगादिसम्भवम् ।।१५४।। दशेश से ६।८।१२ वें भाव में पापग्रह से युत हो तो राजा, चोर अग्नि का भय, ज्वररोग की सम्भावना।।१५४।। विदेशगमनंचार्त्तिः लभते फल वैभयम् । द्वितीयद्यूननाथे तु ज्वरपीडा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं शिवपूजां च कारयेत् ।।१५५।। विदेश यात्रा और कष्ट तथा भय होता है। यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो ज्वर पीड़ा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ शिवजी का पूजन करना चाहिये।।१५५।। इति चन्द्रान्तर्दशाफलम् । अथ भौमदशायां भौमान्तर्दशाफलम् - कुजस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । लाभे वा धन संयुक्ते दुश्चिक्ये शुभसंयुते ।।१५६।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७१ भौम की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ वा धन वा ३रे भाव में शुभग्रह से युत।।१५६।। लग्नाधिपेन संयुक्ते राजानुग्रहवैभवम् । लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि नष्टराज्यार्थलाभकृत् ॥१५७॥ वा लग्नेश से युत भौम के अन्तर में राजा की कृपा से वैभव, लक्ष्मी के आगमन का चिह्न, नष्ट हुये राज्य की प्राप्ति।।१५७।। पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे गोक्षीरसंकुलम् । स्वोच्चे वा स्वर्शगे भौमे स्वांशे वा वलसंयुते ॥१५८॥ पुत्रोत्पत्ति का उत्सव, सन्तोष, गृह में गौ, दूध आदि का संग्रह, यदि अपने उच्च वा अपने राशि वा अपने नवांश में बली भौम हो।।१५८।। गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गोमहिष्यादि लाभकृत् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥१५९॥ गृह, खेत, भूमि में वृद्धि, गौ, भैंस आदि का लाभ और महाराजा की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि और सुख होता है।।१५९।। षष्ठाष्टमव्यये भौमे पापद्ग्योगसंयुते । मूत्रकृच्छ्रादिरोगश्च मेहाधिक्यं व्रणाद्वयम् ॥१६०॥ यदि ६।८।१२ भाव में पापग्रह से दृष्टयुत भौम हो तो मूत्रकृच्छ (सुजाक), प्रमेह और फोड़ा से भय।।१६०।। चौराहिराजपीडाच धनधान्यपशुक्षयम् । द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरुजम् ॥१६१॥ चोर, सर्प राजा से कष्ट, धनधान्य और पशु की हानि होती है। द्वितीय, सप्तम का स्वामी हो तो शरीर में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है।।१६१।। तद्दोषपरिहारार्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् । अनड्वाहं प्रदद्याच्च कुजदोष निवृत्तये । आरोग्यं कुरुते तस्य सर्वसम्पत्तिदायकम् ॥१६२॥ इस दोष की शान्ति के लिये रुद्रजप करावे, बैल का दान करे इससे भौम के दोष की निवृत्ति होकर शरीर आरोग्य होता है और सभी सम्पत्ति का लाभ होता है।।१६२।।

४७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् - भौमस्यान्तर्गते राहौ स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ॥१६३॥ भौम की दशा में अपने उच्च, मूलत्रिकोण में शुभग्रह से युत वा दृष्ट केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये राहु के अन्तर में॥१६३॥ तत्काले राजसन्मानं गृहभूम्यादिलाभकृत् । कलत्रपुत्रलाभः स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम् ॥१६४॥ राजा के सम्माने, गृह, भूमि आदि का लाभ, स्त्री, पुत्र का लाभ तथा रोजगार से अधिक लाभ होता है॥१६४॥ गङ्गास्नानफलावाप्तिं विदेशगमनं तथा । षष्ठाष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथ वीक्षिते ॥१६५॥ गंगा स्नान का लाभ और विदेश की यात्रा होती है। यदि भौम ६।८।१२ भाव में पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो॥१६५॥ चौरादिब्रणभीतिश्च चतुष्पाज्जीवनाशनम् । वातपित्तक्षयं चैव कारागृह निवेशनम् ॥१६६॥ चोर, फोड़ा आदि का भय, चतुष्पद की हानि, वात, पित्त की हानि, जेल यात्रा॥१६६॥ धनस्थानगते राहौ धननाशं महद्भयम् । द्वितीये द्यूनगेवापि ह्यपमृत्युभयं महत् ॥१६७॥ धन स्थान में राहु हो तो धन का नाश और भय होता है २।७ भाव में हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥१६७॥ नागदानं प्रकुर्वीत देवब्राह्मण भोजनम् । मृत्युंजयं जपं कुर्यादायुरारोग्य प्राप्तये ॥१६८॥ इसके शान्त्यर्थ नाग की मूर्त्ति का दान, ब्राह्मण भोजन, मृत्युंजय का जप कराना चाहिये॥१६८॥ अथ भौमदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम् - भौमस्यान्तर्गते जीवे त्रिकोणे केन्द्रमेऽपि वा । लाभे वा धनसंयुक्ते तुङ्गाशे स्वांशभेऽपि वा ॥१६९॥ मंगल की दशा में गुरु का अन्तर हो और यदि गुरु त्रिकोण में वा केन्द्र में -

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७३ वा एकादश भाव वा द्वितीय भाव में अपने उच्चांश में वा अपने अंश में हो तो।।१६९।। सत्कीर्त्ति राजसन्मानं धनधान्यस्यवृद्धिकृत् । गृहेकल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत् ।।१७०।। श्रेष्ठ कीर्ति, राजा से सम्मान, धनधान्य की वृद्धि होती है। और गृह में कल्याण, सम्पत्ति, स्त्री पुत्र आदि का लाभ होता है।।१७०।। दायेशात्केन्द्रराशिस्ये त्रिकोणेलाभगेऽपि वा । भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते वाहनाधिपसंयुते ।।१७१।। यदि गुरु दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में भाग्येश कर्मेश से युत हो वा सुखेश से युत हो।।१७१।। लग्नाधिपसमायुक्ते शुभांशे शुभवर्गगे । गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गृहे कल्याणसम्पदः ।।१७२।। वा लग्नेश से युत हो शुभग्रह के अंश में शुभग्रह के वर्ग में हो तो गृह क्षेत्र आदि की वृद्धि गृह में कल्याण सम्पत्ति।।१७२।। देहारोग्यं महत्कीर्तिर्गेहे गोकुलसंग्रहः । चतुष्पाज्जीवलाभ स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम् ।।१७३।। शरीर में आरोग्यता, महान कीर्त्ति, गौओं की वृद्धि, व्यवसाय करने से अधिक लाभ।।१७३।। कलत्रपुत्रविभवं राजसन्मान वैभवम् । षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वास्तंगते यदि ।।१७४।। स्त्री पुत्रादि का सुख और राजा से सम्मान और वैभव की प्राप्ति होती है। यदि गुरु ६।८।१२ स्थान में अपनी नीच राशि में वा अस्तंगत हो।।१७४।। पापग्रहेणसंयुक्ते दृष्टे वा दुर्बले यदि । चौरादिनृपभीतिश्च पित्तरोगार्दि सम्भवम् ।।१७५।। पापग्रह से युक्त दृष्ट हो वा दुर्बल हो तो चौरादिकों से और राजा से भय होता हैं, पित्त के रोगों की संभावना होती है।।१७५।। प्रेतवाधां भृत्यनाशं सोदराणां विनाशनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युज्वरादिकम् । तद्दोषपरिहारार्थ शिवसाहस्रकं जपेत् ।।१७६।।

४७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । प्रेतबाधा का भय, नौकर की हानि, भाइयों की हानि होती है। २।७ भाव के स्वामी हों तो अपमृत्यु का भय होता है, इस दोष की शान्ति के लिये शिवसहस्रनाम का जप करना चाहिये।।१७६।। अथ भौमदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् - कुजस्यान्तर्गते मन्दे स्वक्षें केन्द्रत्रिकोणगे । मूलत्रिकोणे केन्द्रे वा तुङ्गांशे स्वांशगेऽथवा ।।१७७।। भौम की दशा में अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपने मूलत्रिकोण में होकर केन्द्र में वा उच्चांश में वा अपने नवांश में हो।।१७७।। लग्नाधिपतिना वापि शुभदृष्टियुते बले । राज्यसौख्यं यशोवृद्धिं स्वग्रामे धान्यवृद्धिकृत् ।।१७८।। लग्नेश के साथ शुभग्रह से दृष्टयुत शनि हो तो इसके अन्तर में राजसुख यश की वृद्धि, अपने ग्राम में धान्य की वृद्धि।।१७८।। पुत्रपौत्र समायुक्तो गृहे गोधनसंग्रहः । स्ववारे राजसन्मानं स्वमासे पुत्रवृद्धिकृत् ।।१७९।। पुत्र पौत्र से युक्त गौ आदि के सुख से पूर्ण होता है। शनि के दिन राजा से सम्मान और शनि के मास में पुत्र की वृद्धि होती है।।१७९।। नीचादि क्षेत्रगे मन्दे षष्ठाष्टव्ययराशिगे । म्लेक्षवर्गप्रभुभयं धनधान्यादिनाशनम् ।।१८०।। यदि शनि अपने नीच आदि में हो ६।८।१२ भाव में हो तो म्लेक्ष राजा से भय, धन धान्य की हानि।।१८०।। निगडं बन्धनं रोगमंते क्षेत्रविनाशकृत् । द्वितीयद्यूननाथे तु पापयुक्ते महद्भयम् ।।१८१।। हथकड़ी बेड़ी का बंधन, रोग और अन्त में विनाश होता है। यदि शनि २।१२ भाव का स्वामी हो और पापग्रह से युक्त हो तो महाभय।।१८१।। धननाशं च संचारं राजद्वेषं मनोरुजम् । चौराग्निनृपपीडा च सहोदर विनाशनम् ।।१८२।। धन का नाश, यात्रा, राजा से द्वेष, मानसिक कष्ट, चोर अग्नि तथा राजा से पीडा, सहोदर की हानि।।१८२।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७५ बन्धुद्वेषकरश्चैव जीवहानिश्च जायते । अकस्माच्च मृतेर्भीतिः पुत्रदारादिपीडनम् ।।१८३।। बन्धुओं से द्वेष, किसी जीव की हानि, अकस्मात् मृत्यु भय, पुत्र, स्त्री आदि को पीडा।।१८३।। कारागृहादिभीतिश्च राजदण्डो महद्भयम् । दायेशात्केन्द्रराशिस्थे लाभस्थे वा त्रिकोणगे ।।१८४।। जेलयात्रा का भय राजदण्ड का भय होता है। दशेश से केन्द्र वा लाभ स्थान वा त्रिकोण में हो तो।।१८४।। विदेशयानं लभते दुष्कीर्तिर्विविधा तथा । पापकर्मरतो नित्यं बहुजीवादिहिंसकः ।।१८५।। विदेश यात्रा, अनेक प्रकार के अपयश, निरन्तर पापकर्म में संलग्न अनेक जीवों की हिंसा।।१८५।। विग्रहः क्षेत्रहानिश्च स्थानभ्रंशो मनोव्यथा । युद्धेष्वपजयं चैव मूत्रकृच्छ्रान्महद्भयम् ।।१८६।। आपस में विग्रह, क्षेत्रादि की हानि, स्थान-च्युति और मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) का भय होता है।।१८६।। दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा पापसंयुते । तद्भुक्तौ मरणं ज्ञेयं नृपचौरादिपीडनम् ।।१८७।। दशेश से ६।८।१२ में पापग्रह से युत हो तो अपने अन्तर में मृत्यु और राजा चोर आदि की पीड़ा से युक्त।।१८७।। वातपीडा च शूलादिज्ञातिशत्रुभयं भवेत् । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजयजपं चरेत् ।।१८८। वात रोग से कष्ट, शूल रोग और जातीय लोगों तथा शत्रु का भय होता है। इसकी शान्ति के लिये मृत्युंजय मंत्र का जप कराना चाहिये।।१८८।। अथभौमदशायांबुधान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते सौम्ये लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । सत्कथाश्चाजपादानं धर्मबुद्धिर्महद्यशः ।।१८९।। भौम की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये बुध के अन्तर में अच्छे लोगों से सत्संग, अजपा जप, धर्म में प्रवीणता, यश का लाभ।।१८९।।

४७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । नीतिमार्गप्रसङ्गश्च नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । वाहनाम्बरपश्वादिराजकर्म सुखानि च ॥१९०॥ नीति मार्ग का अवलम्बन और नित्य मिष्टान्न का भोजन, वाहन, वस्त्र, पशु का लाभ, राजकार्य में व्यस्त और सुख॥१९०॥ कृषिकर्मफलं सिद्धिर्वारणाम्बरभूषणम् । नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपि वा ॥१९१॥ कृषि कर्म में प्रवृत्ति और भूषणादि तथा वाहन की प्राप्ति होती है। यदि बुध नीच वा अस्त हो अथवा ६।८।१२ भाव में हो तो॥१९१॥ हृद्रोगं मानहानिश्च निगडं बन्धुनाशनम् । दारपुत्रार्थनाशः स्याच्चतुष्पाज्जीवनाशनम् ॥१९२॥ हृदय रोग, धन की हानि, बंधन, बन्धुओं की हानि, स्त्री पुत्र चतुष्पद का नाश होता है॥१९२॥ दशाधिपेन संयुक्ते शत्रुबुद्धिर्महद्भयम् । विदेशगमनं चैव नानारोगस्तथैव च ॥१९३॥ दशेश से युक्त हो तो शत्रुता की वृद्धि, और भय, विदेशयात्रा, अनेक रोग॥१९३॥ राजद्वारे विरोधश्च कलहः सौम्यमुक्तिषु । दायेशात्केन्द्रकोणे वा स्वोच्चे युक्तार्थलाभकृत् ॥१९४॥ राजा से विरोध और कलह होता है। दशेश से केन्द्र वा अपने उच्च में हो तो धन का लाभ॥१९४॥ अनेकधननाथत्वं राजसन्मानमेव च । भूपालयोगं कुरुते धनाम्बरविभूषणम् ॥१९५॥ अनेक धनी संस्थाओं का स्वामी। राजा से सम्मान, राजयोग का सुख, धन- वस्त्र आभूषण का लाभ॥१९५॥ भूरिवाद्यमृदङ्गादि सेनापत्यं महत्सुखम् । विद्याविनोदविमला वस्त्रवाहनभूषणम् ॥१९६॥ बहुत से बाजों मृदङ्ग आदि का सुख सेनापतित्व और बड़ा सुख, विद्या का विनोद, वस्त्र, वाहन आभूषण॥१९६॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७७ दारपुत्रादिविभवं गृहेलक्ष्मीकटाक्षकृत् । दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते ।।१९७।। स्त्री, पुत्र आदि का सुख और गृह में लक्ष्मी का प्रवेश होता है। दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो।।१९७।। तद्दाये मानहानिस्यात्क्रूरबुद्धिस्तु क्रूरवाक् । चौराग्निनृपपीडा च मार्गे चौरभयादिकम् ।।१९८।। बुध के अन्तर में मानहानि, दुष्टबुद्धि होती है कटुवचन, चोर, अग्नि, राजा से पीडा, मार्ग में चोरों का भय।।१९८।। अकस्मात्कलहश्चैव बुधभुक्तौ न संशयः । द्वितीयद्यूननाथेतु महाव्याधिर्भयंकरा ।।१९९।। अकस्मात् कलह होता है इसमें संशय नहीं है। यदि बुध २।१२ भाव का स्वामी हो तो महाभयंकर व्याधि होती है।।१९९।। अश्वदानं प्रकुर्वीत विष्णोर्नामसहस्रकम् । सर्वसम्पत्प्रदं सौख्यं सर्वारिष्टप्रशांतिदम् ।।२००।। इसके शान्त्यर्थ अश्वदान करना चाहिये और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से सभी प्रकार की सम्पत्तियों का लाभ और सभी अरिष्टों का नाश होता है।।२००।। अथ भौमदशायांकेन्वन्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते केतौ त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा । दुश्चिक्ये लाभगे वापि शुभयुक्ते शुभेक्षिते ।।२०१।। भौम की दशा में त्रिकोण वा ३ वा ११ भाव में गये हुये शुभग्रह से युक्त दृष्ट केतु के अन्तर में।।२०१।। राजानुग्रहशान्तिश्च बहुसौख्यं धनागमम् । किञ्चित्फलं दशादौ तु भूलाभं पुत्र लाभकृत् ।।२०२।। राजा की कृपा से शान्ति और बहुत सुख की प्राप्ति, धन का आगमन होता है। कुछ फल दशा के आदि में होता है बाद में भूमि लाभ, पुत्र का लाभ होता है।।२०२।। राजसंलाभकार्याणि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । योगकारकसंस्थाने बलवीर्यसमन्विते ।।२०३।।

४७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राज्यं लाभकारी कार्यों में संलग्न चतुष्पद जीवों का लाभ होता है योगकारक के स्थान में बलवान् केतु के रहने से॥२०३॥ पुत्रलाभो यशोवृद्धिर्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् । भृत्यवर्गधनप्राप्तिः सेनापत्यं महत्सुखम् ।।२०४।। पुत्र का लाभ, यश की वृद्धि, गृह में लक्ष्मी का प्रवेश, नौकरों द्वारा भी धन का लाभ॥२०४॥ भूपालमित्रं कुरुते यानाम्बर विभूषणम् । दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते ।।२०५।। राजा से मित्रता और यज्ञ आदि से वस्त्र आभूषण का लाभ होता है। दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो॥२०५॥ कलहो दन्तरोगश्च चौरव्याघ्रादिपीडनम् । ज्वरातिसारकुष्ठादिदारपुत्रादिपीडनम् ।।२०६।। कलह दांत में रोग, चोर व्याघ्र से पीड़ा होती है। ज्वरातिसार और कुष्ठ रोग होता है, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा होती है॥२०६॥ द्वितीयसप्तमस्थाने देहे व्याधिर्भविष्यति । सन्मानं धनसन्तापं धनधान्यस्य प्रच्युतिम् । मृत्युंजयं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।२०७।। २।७ स्थान में हो तो शरीर में व्याधि का भय, धन का संताप, धन-धान्य की हानि होती है। इसके शान्त्यर्थ भी सम्पत्ति को देने वाले मृत्युंजय मंत्र का जप कराना चाहिये॥२०७॥ अथभौमदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि शुभस्थानाधिपेऽथवा ।।२०८।। भौम की दशा में केन्द्र, लाभ, त्रिकोण वा अपने उच्च, अपनी राशि में गये हुये शुक्र के अन्तर में वा शुभ स्थान के स्वामी शुक्र के अन्तर में॥२०८॥ राज्यलाभं महत्सौख्यं गजाश्वाम्बरभूषणम् । लग्नाधिपेन सम्बन्धे पुत्रदारादिवर्धनम् ।।२०९।। राज्य का लाभ, बड़ा सुख, हाथी, घोड़ा, वस्त्र, आभूषण का सुख होता है। लग्नेश से संबन्ध करता हो तो पुत्र, स्त्री आदि की वृद्धि॥२०९॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७९ आयुषो वृद्धिंरैश्वर्यं भाग्यवृद्धिसुखं भवेत् । दायेशात्केन्द्रलाभस्थे कोणेवा धनगेऽपि वा ॥२१०॥ आयुष्य की वृद्धि, ऐश्वर्य और भाग्यवृद्धि तथा सुखं होता है। दशेश से केन्द्र लाभ, त्रिकोण वा धन स्थान में हो तो।।२१०।। तत्काले श्रियमाप्नोति पुत्रलाभं महत्सुखम् । स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं श्वेतवस्त्रादिलाभकृत् ॥२११॥ तत्काल लक्ष्मी की प्राप्ति पुत्र का लाभ और बहुत सुख होता है। अपने स्वामी की कृपा से बड़ा सुख सफेद वस्त्र आदि का लाभ होता है।।२११।। महाराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभदम् । मुक्त्यन्ते फलमाप्नोतिगीतनृत्यादिलाभकृत् ॥२१२॥ राजा की कृपा से ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है, दशा के अन्त में गती, नृत्य आदि का सुख ।।२१२।। पुण्यतीर्थस्नानलाभं कर्माधिपसमन्विते । दानधर्मदयापुण्यं तडागं कारयिष्यति ॥२१३॥ पुण्यतीर्थ में स्नान का लाभ होता है। कर्मेश से युक्त हो तो दान, धर्म, दया, पुण्य होता है और तालाब आदि को बनवाता है।।२१३।। दायेशाद्रन्ध्ररिःफस्थे षष्ठे वा पापसंयुते । करोति दुःखबाहुल्यं देहपीडां धनक्षयम् ॥२१४॥ दशेश से ८।१२।६ स्थान में पापग्रह से युत हो तो अत्यन्त दुःख, शरीर में पीड़ा, धन का नाश।।२१४।। राजचौरादिभीतिश्च गृहे कलहमेव च । दारपुत्रादिपीडा च गोमहिष्यादिनाशकृत् ॥२१५॥ राजा, चोर का भय, घर का कलह, स्त्री पुत्रादि को कष्ट, गौ, भैंस आदि का नाश होता है।।२१५।। द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति । श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यप्राप्तये ॥२१६॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर की बाधा होती है। इसकी शान्ति के लिये सफेद गौ सफेद भैंस का दान करना चाहिये।।२१६।।

४८० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमदशायां सूर्य्यान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । मूलत्रिकोणलाभे वा भाग्यकर्मेशसंयुते ॥२१७॥ भौम की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में वा केन्द्र वा मूलत्रिकोण वा लाभ स्थान में गये हुये भाग्येश कर्मेश से युत सूर्य के अन्तर में॥२१७॥ तद्भुक्तौ वाहनं कीर्त्तिः पुत्रलाभं च विंदति । धनधान्यसमृद्धिः स्याद्गृहे कल्याणसम्पदः ॥२१८॥ वाहन, यश और पुत्र का लाभ होता है। धन धान्य आदि समृद्धि का लाभ, गृह में कल्याण॥२१८॥ क्षेमारोग्यं महैश्वर्यं राजपूज्यं महत्सुखम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं विदेशे राजदर्शनम् ॥२१९॥ कुशल आरोग्यता, महाऐश्वर्य, राजा से पूजा, सुख, विदेश में रोजगार से लाभ और राजा का दर्शन होता है॥२१९॥ दायेशात्षष्ठरिःफेवा रन्ध्रे वा पापसंयुते । देहपीडा मनस्तापः कार्यहानिर्महद्भयम् ॥२२०॥ दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो शरीर में पीड़ा मन में संताप, कार्य की हानि, भय॥२२०॥ शिरोरोगं ज्वरादिश्च अतीसारमथापि वा । द्वितीयद्यूननाथे तु सर्पज्वरविषाद्भयम् ॥२२१॥ शिर में रोग, ज्वर और अतिसार होता है। २।७ भाव के स्वामी हों तो सर्प, ज्वर, विष से भय॥२२१॥ सुतपीडाकरं चैव शान्तिं कुर्याद्यथाविधि । देहारोग्यं प्रकुरुते धनधान्य समृद्धिदम् ॥२२२॥ पुत्र को पीड़ा होती हैं। इसकी यथाविधि शान्ति करने से देह में आरोग्यता और धन धान्य की वृद्धि होती है॥२२२॥ कुजस्यानन्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । भाग्यवाहनकर्मेशलग्नाधिपसमंन्विते ॥२२३॥ भौम की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र में गये हुये भाग्य चतुर्थ, दशम, और लग्नेश से युक्त चन्द्रमा के अन्तर में॥२२३॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८१ करोति विपुलं राज्यं गन्धमाल्याम्बरीदिकम् । तडागं गोपुरादीनां पुण्यधर्मादिसंग्रहम् ॥२२४॥ बड़े राज्य का गंध, माल्य वस्त्रादि के साथ लाभ होता है, तालाब किला आदि का निर्माण होता है, पुण्य धर्म आदि होते हैं॥२२४॥ विवाहोत्सवकर्माणि दारपुत्रादिसौख्यकृत् । पितृमातृसुखप्राप्तिं गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् ॥२२५॥ विवाहादि उत्सव होता है। स्त्री पुत्रादि का सुख होता है, पिता-माता का सुख होता है और गृह में लक्ष्मी का वास होता है॥२२५॥ महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिसुखादिकम् । पूर्णचन्द्रे पूर्णफलं क्षीणे स्वल्पफलं भवेत् ॥२२६॥ राजा की प्रसन्नता से अभीष्ट की सिद्धि होती है पूर्ण चन्द्रमा हो तो पूर्णफल और क्षीणचन्द्र हो तो अल्प फल होता है॥२२६॥ नीचारिस्थेऽष्टमे व्यये दायेशाद्रिपुरंध्रके । मरणं दारपुत्राणां कष्टं भूमतिनाशनम् ॥२२७॥ यदि चन्द्रमा नीच राशि. में ६।८।१२ भाव में वा दशेश से ६।८ भाव में हो तो अपने अन्तर में स्त्री पुत्र का मरण और भूमि की हानि होती है॥२२७॥ पशुधान्यक्षयं चैव चौरादिरणभीतिकृत् । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ॥२२८॥ पशु, धान्य का नाश चौर आदि का और संग्राम का भय होता है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अकाल मृत्यु होती है॥२२८॥ देहजाड्यं मनोदुःखं दुर्गालक्ष्मीजपं चरेत् । श्वेतां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ॥२२९॥ देह जड़ता और मानसिक दुःख होता है। शान्ति के लिये दुर्गा और लक्ष्मी का जप, सफेद गौ और भैंस का दान कराना चाहिये इसके करने से आरोग्यता होती है॥२२९॥ • इति कुजदशायामन्तर्दशाफलम्। अथ राहुदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्- कुलीरे वृश्चिके चैव कन्यायां वा चापगेहगेऽगौ । तद्भुक्तौ राजसन्मानं वस्त्रवाहनभूषणम् ॥२३०॥

४८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कर्क वा वृश्चिक वा कन्या वा धन में राहु हो तो राहु की दशा में राहु के ही अन्तर में राजा से सम्मान, वस्त्र, वाहन का लाभ होता है।।२३०।। व्यवसायात्फलाधिक्यं चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । प्रयाणं पश्चिमे भागे वाहनाम्बरलाभकृत् ।।२३१।। व्यवसाय (रोजगार) से अधिक लाभ, चतुष्पद का लाभ होता है। पश्चिम दिशा की यात्रा होती है और उससे वाहन, वस्त्र का लाभ होता है।।२३१।। लग्नादुपचये राहौ शुभग्रहयुतेक्षिते । मित्रांशेतुङ्गलाभेशे योगकारकसंयुते ।।२३२।। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) भाव में राहु शुभग्रह से युत दृष्ट हो वा मित्रांश में वा उच्चांश में लाभ दशम के अंश में हो और योगकारक से युत हो तो।।२३२।। राज्यलाभं महोत्साहं राजप्रीतिं शुभावहाम् । गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिवर्धनम् ।।२३३।। राज्य का लाभ, उत्साह, और राजा से प्रेम होता है। गृह में कल्याण, सम्पत्ति, स्त्री पुत्र आदि की वृद्धि होती है।।२३३।। षष्ठाष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथवीक्षिते । चौरादिब्रणपीडाच सर्वत्र जनपीडनम् ।।२३४।। यदि राहु ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चोर आदि से, फोड़ा- आदि से पीड़ा और परिवार के लोगों को कष्ट होता है।।२३४।। राजद्वारजनद्वेष इष्टबन्धुविनाशनम् । दारपुत्रादिपीडा च सर्वत्र जनपीडनम् ।।२३५।। राजकर्मचारियों से शत्रुता अभीष्ट बंधु का नाश होता है, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा और अपने लोगों को कष्ट होता है।।२३५।। द्वितीयद्यूननाथेतु सप्तमस्थानमाश्रितः । सदा रोगं महाकष्टं शांतिकुर्याद्यथाविधि । आरोग्यं सम्पदश्चैव भविष्यति न संशयः ।।२३६।। २।७ भाव का स्वामी हो और ७ वें भाव में बैठा हो तो सदा रोग और महाकष्ट होता है। इसकी शान्ति यथाविधि करने से आरोग्य और सम्पत्ति का लाभ होता है इसमें संशय नहीं।।२३६।।