बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमदशायां सूर्य्यान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । मूलत्रिकोणलाभे वा भाग्यकर्मेशसंयुते ॥२१७॥ भौम की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में वा केन्द्र वा मूलत्रिकोण वा लाभ स्थान में गये हुये भाग्येश कर्मेश से युत सूर्य के अन्तर में॥२१७॥ तद्भुक्तौ वाहनं कीर्त्तिः पुत्रलाभं च विंदति । धनधान्यसमृद्धिः स्याद्गृहे कल्याणसम्पदः ॥२१८॥ वाहन, यश और पुत्र का लाभ होता है। धन धान्य आदि समृद्धि का लाभ, गृह में कल्याण॥२१८॥ क्षेमारोग्यं महैश्वर्यं राजपूज्यं महत्सुखम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं विदेशे राजदर्शनम् ॥२१९॥ कुशल आरोग्यता, महाऐश्वर्य, राजा से पूजा, सुख, विदेश में रोजगार से लाभ और राजा का दर्शन होता है॥२१९॥ दायेशात्षष्ठरिःफेवा रन्ध्रे वा पापसंयुते । देहपीडा मनस्तापः कार्यहानिर्महद्भयम् ॥२२०॥ दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो शरीर में पीड़ा मन में संताप, कार्य की हानि, भय॥२२०॥ शिरोरोगं ज्वरादिश्च अतीसारमथापि वा । द्वितीयद्यूननाथे तु सर्पज्वरविषाद्भयम् ॥२२१॥ शिर में रोग, ज्वर और अतिसार होता है। २।७ भाव के स्वामी हों तो सर्प, ज्वर, विष से भय॥२२१॥ सुतपीडाकरं चैव शान्तिं कुर्याद्यथाविधि । देहारोग्यं प्रकुरुते धनधान्य समृद्धिदम् ॥२२२॥ पुत्र को पीड़ा होती हैं। इसकी यथाविधि शान्ति करने से देह में आरोग्यता और धन धान्य की वृद्धि होती है॥२२२॥ कुजस्यानन्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । भाग्यवाहनकर्मेशलग्नाधिपसमंन्विते ॥२२३॥ भौम की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र में गये हुये भाग्य चतुर्थ, दशम, और लग्नेश से युक्त चन्द्रमा के अन्तर में॥२२३॥