बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७३ वा एकादश भाव वा द्वितीय भाव में अपने उच्चांश में वा अपने अंश में हो तो।।१६९।। सत्कीर्त्ति राजसन्मानं धनधान्यस्यवृद्धिकृत् । गृहेकल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत् ।।१७०।। श्रेष्ठ कीर्ति, राजा से सम्मान, धनधान्य की वृद्धि होती है। और गृह में कल्याण, सम्पत्ति, स्त्री पुत्र आदि का लाभ होता है।।१७०।। दायेशात्केन्द्रराशिस्ये त्रिकोणेलाभगेऽपि वा । भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते वाहनाधिपसंयुते ।।१७१।। यदि गुरु दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में भाग्येश कर्मेश से युत हो वा सुखेश से युत हो।।१७१।। लग्नाधिपसमायुक्ते शुभांशे शुभवर्गगे । गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गृहे कल्याणसम्पदः ।।१७२।। वा लग्नेश से युत हो शुभग्रह के अंश में शुभग्रह के वर्ग में हो तो गृह क्षेत्र आदि की वृद्धि गृह में कल्याण सम्पत्ति।।१७२।। देहारोग्यं महत्कीर्तिर्गेहे गोकुलसंग्रहः । चतुष्पाज्जीवलाभ स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम् ।।१७३।। शरीर में आरोग्यता, महान कीर्त्ति, गौओं की वृद्धि, व्यवसाय करने से अधिक लाभ।।१७३।। कलत्रपुत्रविभवं राजसन्मान वैभवम् । षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वास्तंगते यदि ।।१७४।। स्त्री पुत्रादि का सुख और राजा से सम्मान और वैभव की प्राप्ति होती है। यदि गुरु ६।८।१२ स्थान में अपनी नीच राशि में वा अस्तंगत हो।।१७४।। पापग्रहेणसंयुक्ते दृष्टे वा दुर्बले यदि । चौरादिनृपभीतिश्च पित्तरोगार्दि सम्भवम् ।।१७५।। पापग्रह से युक्त दृष्ट हो वा दुर्बल हो तो चौरादिकों से और राजा से भय होता हैं, पित्त के रोगों की संभावना होती है।।१७५।। प्रेतवाधां भृत्यनाशं सोदराणां विनाशनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युज्वरादिकम् । तद्दोषपरिहारार्थ शिवसाहस्रकं जपेत् ।।१७६।।