बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । प्रेतबाधा का भय, नौकर की हानि, भाइयों की हानि होती है। २।७ भाव के स्वामी हों तो अपमृत्यु का भय होता है, इस दोष की शान्ति के लिये शिवसहस्रनाम का जप करना चाहिये।।१७६।। अथ भौमदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् - कुजस्यान्तर्गते मन्दे स्वक्षें केन्द्रत्रिकोणगे । मूलत्रिकोणे केन्द्रे वा तुङ्गांशे स्वांशगेऽथवा ।।१७७।। भौम की दशा में अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपने मूलत्रिकोण में होकर केन्द्र में वा उच्चांश में वा अपने नवांश में हो।।१७७।। लग्नाधिपतिना वापि शुभदृष्टियुते बले । राज्यसौख्यं यशोवृद्धिं स्वग्रामे धान्यवृद्धिकृत् ।।१७८।। लग्नेश के साथ शुभग्रह से दृष्टयुत शनि हो तो इसके अन्तर में राजसुख यश की वृद्धि, अपने ग्राम में धान्य की वृद्धि।।१७८।। पुत्रपौत्र समायुक्तो गृहे गोधनसंग्रहः । स्ववारे राजसन्मानं स्वमासे पुत्रवृद्धिकृत् ।।१७९।। पुत्र पौत्र से युक्त गौ आदि के सुख से पूर्ण होता है। शनि के दिन राजा से सम्मान और शनि के मास में पुत्र की वृद्धि होती है।।१७९।। नीचादि क्षेत्रगे मन्दे षष्ठाष्टव्ययराशिगे । म्लेक्षवर्गप्रभुभयं धनधान्यादिनाशनम् ।।१८०।। यदि शनि अपने नीच आदि में हो ६।८।१२ भाव में हो तो म्लेक्ष राजा से भय, धन धान्य की हानि।।१८०।। निगडं बन्धनं रोगमंते क्षेत्रविनाशकृत् । द्वितीयद्यूननाथे तु पापयुक्ते महद्भयम् ।।१८१।। हथकड़ी बेड़ी का बंधन, रोग और अन्त में विनाश होता है। यदि शनि २।१२ भाव का स्वामी हो और पापग्रह से युक्त हो तो महाभय।।१८१।। धननाशं च संचारं राजद्वेषं मनोरुजम् । चौराग्निनृपपीडा च सहोदर विनाशनम् ।।१८२।। धन का नाश, यात्रा, राजा से द्वेष, मानसिक कष्ट, चोर अग्नि तथा राजा से पीडा, सहोदर की हानि।।१८२।।