भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७५ बन्धुद्वेषकरश्चैव जीवहानिश्च जायते । अकस्माच्च मृतेर्भीतिः पुत्रदारादिपीडनम् ।।१८३।। बन्धुओं से द्वेष, किसी जीव की हानि, अकस्मात् मृत्यु भय, पुत्र, स्त्री आदि को पीडा।।१८३।। कारागृहादिभीतिश्च राजदण्डो महद्भयम् । दायेशात्केन्द्रराशिस्थे लाभस्थे वा त्रिकोणगे ।।१८४।। जेलयात्रा का भय राजदण्ड का भय होता है। दशेश से केन्द्र वा लाभ स्थान वा त्रिकोण में हो तो।।१८४।। विदेशयानं लभते दुष्कीर्तिर्विविधा तथा । पापकर्मरतो नित्यं बहुजीवादिहिंसकः ।।१८५।। विदेश यात्रा, अनेक प्रकार के अपयश, निरन्तर पापकर्म में संलग्न अनेक जीवों की हिंसा।।१८५।। विग्रहः क्षेत्रहानिश्च स्थानभ्रंशो मनोव्यथा । युद्धेष्वपजयं चैव मूत्रकृच्छ्रान्महद्भयम् ।।१८६।। आपस में विग्रह, क्षेत्रादि की हानि, स्थान-च्युति और मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) का भय होता है।।१८६।। दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा पापसंयुते । तद्भुक्तौ मरणं ज्ञेयं नृपचौरादिपीडनम् ।।१८७।। दशेश से ६।८।१२ में पापग्रह से युत हो तो अपने अन्तर में मृत्यु और राजा चोर आदि की पीड़ा से युक्त।।१८७।। वातपीडा च शूलादिज्ञातिशत्रुभयं भवेत् । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजयजपं चरेत् ।।१८८। वात रोग से कष्ट, शूल रोग और जातीय लोगों तथा शत्रु का भय होता है। इसकी शान्ति के लिये मृत्युंजय मंत्र का जप कराना चाहिये।।१८८।। अथभौमदशायांबुधान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते सौम्ये लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । सत्कथाश्चाजपादानं धर्मबुद्धिर्महद्यशः ।।१८९।। भौम की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये बुध के अन्तर में अच्छे लोगों से सत्संग, अजपा जप, धर्म में प्रवीणता, यश का लाभ।।१८९।।