बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् - भौमस्यान्तर्गते राहौ स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ॥१६३॥ भौम की दशा में अपने उच्च, मूलत्रिकोण में शुभग्रह से युत वा दृष्ट केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये राहु के अन्तर में॥१६३॥ तत्काले राजसन्मानं गृहभूम्यादिलाभकृत् । कलत्रपुत्रलाभः स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम् ॥१६४॥ राजा के सम्माने, गृह, भूमि आदि का लाभ, स्त्री, पुत्र का लाभ तथा रोजगार से अधिक लाभ होता है॥१६४॥ गङ्गास्नानफलावाप्तिं विदेशगमनं तथा । षष्ठाष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथ वीक्षिते ॥१६५॥ गंगा स्नान का लाभ और विदेश की यात्रा होती है। यदि भौम ६।८।१२ भाव में पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो॥१६५॥ चौरादिब्रणभीतिश्च चतुष्पाज्जीवनाशनम् । वातपित्तक्षयं चैव कारागृह निवेशनम् ॥१६६॥ चोर, फोड़ा आदि का भय, चतुष्पद की हानि, वात, पित्त की हानि, जेल यात्रा॥१६६॥ धनस्थानगते राहौ धननाशं महद्भयम् । द्वितीये द्यूनगेवापि ह्यपमृत्युभयं महत् ॥१६७॥ धन स्थान में राहु हो तो धन का नाश और भय होता है २।७ भाव में हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥१६७॥ नागदानं प्रकुर्वीत देवब्राह्मण भोजनम् । मृत्युंजयं जपं कुर्यादायुरारोग्य प्राप्तये ॥१६८॥ इसके शान्त्यर्थ नाग की मूर्त्ति का दान, ब्राह्मण भोजन, मृत्युंजय का जप कराना चाहिये॥१६८॥ अथ भौमदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम् - भौमस्यान्तर्गते जीवे त्रिकोणे केन्द्रमेऽपि वा । लाभे वा धनसंयुक्ते तुङ्गाशे स्वांशभेऽपि वा ॥१६९॥ मंगल की दशा में गुरु का अन्तर हो और यदि गुरु त्रिकोण में वा केन्द्र में -