बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७१ भौम की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ वा धन वा ३रे भाव में शुभग्रह से युत।।१५६।। लग्नाधिपेन संयुक्ते राजानुग्रहवैभवम् । लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि नष्टराज्यार्थलाभकृत् ॥१५७॥ वा लग्नेश से युत भौम के अन्तर में राजा की कृपा से वैभव, लक्ष्मी के आगमन का चिह्न, नष्ट हुये राज्य की प्राप्ति।।१५७।। पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे गोक्षीरसंकुलम् । स्वोच्चे वा स्वर्शगे भौमे स्वांशे वा वलसंयुते ॥१५८॥ पुत्रोत्पत्ति का उत्सव, सन्तोष, गृह में गौ, दूध आदि का संग्रह, यदि अपने उच्च वा अपने राशि वा अपने नवांश में बली भौम हो।।१५८।। गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गोमहिष्यादि लाभकृत् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥१५९॥ गृह, खेत, भूमि में वृद्धि, गौ, भैंस आदि का लाभ और महाराजा की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि और सुख होता है।।१५९।। षष्ठाष्टमव्यये भौमे पापद्ग्योगसंयुते । मूत्रकृच्छ्रादिरोगश्च मेहाधिक्यं व्रणाद्वयम् ॥१६०॥ यदि ६।८।१२ भाव में पापग्रह से दृष्टयुत भौम हो तो मूत्रकृच्छ (सुजाक), प्रमेह और फोड़ा से भय।।१६०।। चौराहिराजपीडाच धनधान्यपशुक्षयम् । द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरुजम् ॥१६१॥ चोर, सर्प राजा से कष्ट, धनधान्य और पशु की हानि होती है। द्वितीय, सप्तम का स्वामी हो तो शरीर में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है।।१६१।। तद्दोषपरिहारार्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् । अनड्वाहं प्रदद्याच्च कुजदोष निवृत्तये । आरोग्यं कुरुते तस्य सर्वसम्पत्तिदायकम् ॥१६२॥ इस दोष की शान्ति के लिये रुद्रजप करावे, बैल का दान करे इससे भौम के दोष की निवृत्ति होकर शरीर आरोग्य होता है और सभी सम्पत्ति का लाभ होता है।।१६२।।