बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७० वृहतत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ चन्द्रदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्- चन्द्रस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा धने वा सोदरे बले ।।१५१।। चन्द्रमा की दशा में अपने उच्च या अपने राशि में गये हुये केन्द्र या त्रिकोण या लाभ में वा धन वा तीसरे भाव में बैठे हुये बली सूर्य के अन्तर में ।।१५१।। नष्टराज्य धनप्राप्तिं गृहे कल्याण शोभनम् । मित्रराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।।१५२।। नष्ट हुये राज्य और धन का लाभ, गृह में कल्याण का अनुभव होता है तथा मित्र और राजा की प्रसन्नता से ग्राम भूमि आदि का लाभ ।।१५२।। गर्भाधानकलत्राप्तिर्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् । भुक्त्यन्ते देहजाड्यत्वं ज्वरपीडा भविष्यति ।।१५३।। स्त्री की प्राप्ति और गर्भ की संभावना होती है; गृह में लक्ष्मी का वास होता है। दशा के अन्त में शरीर में जड़ता और ज्वर से पीड़ा होती है।।१५३।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्ययेवा पापसंयुते । नृपचौराग्निभीतिश्च ज्वररोगादिसम्भवम् ।।१५४।। दशेश से ६।८।१२ वें भाव में पापग्रह से युत हो तो राजा, चोर अग्नि का भय, ज्वररोग की सम्भावना।।१५४।। विदेशगमनंचार्त्तिः लभते फल वैभयम् । द्वितीयद्यूननाथे तु ज्वरपीडा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं शिवपूजां च कारयेत् ।।१५५।। विदेश यात्रा और कष्ट तथा भय होता है। यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो ज्वर पीड़ा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ शिवजी का पूजन करना चाहिये।।१५५।। इति चन्द्रान्तर्दशाफलम् । अथ भौमदशायां भौमान्तर्दशाफलम् - कुजस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । लाभे वा धन संयुक्ते दुश्चिक्ये शुभसंयुते ।।१५६।।