भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 800 में से

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पृष्ठ 467

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६९ दशेश के साथ शुक्र हो तो देह का सुख, बड़ा हर्ष, अच्छी कीर्त्ति, सुखं सम्पत्ति का लाभ, गृह, भूमि की वृद्धि होती है।।१४३।। धनस्थानगते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते । निधिलाभं महत्सौख्यं भूलाभं पुत्रसम्भवम् ।।१४४।। यदि शुक्र धन स्थान में अपनी उच्चराशि वा अपनी राशि में हो तो निधि (गड़ा धन) का लाभ, सुख, भूमि का लाभ, पुत्र का लाभ होता है।।१४४।। भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते भाग्यवृद्धिकरो भवेत् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहः ।।१४५।। यदि भाग्येश वा लाभेश से युक्त हो तो भाग्य की वृद्धि करता है महाराज की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि होती है।।१४५।। देवब्राह्मणभक्तिश्च मुक्ताविद्रुमलाभकृत् । दायेशाल्लाभगे शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपिवा ।।१४६।। देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है। मोती-मूंगा का लाभ होता है। दशेश से लाभ स्थान में शुक्र हो वा त्रिकोण वा केन्द्र में हो तो।।१४६।। गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च वित्तलाभं महत्सुखम् । नीचेवास्तंगते शुक्रे पापग्रहयुतेक्षिते ।।१४७।। गृह-भूमि में वृद्धि, धन का लाभ और सुख होता है। यदि शुक्र अपनी नीची राशि वा अस्त हो, पापग्रह से युत वा दृष्ट हो।।१४७।। भूनाशं पुत्रमित्रादिनाशनं पत्निनाशनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थेव्यये वा पापसंयुते ।।१४८।। तो भूमि का नाश, पुत्र मित्र आदि का नाश और स्त्री का नाश होता है। दशेश से ६।८।१२ वें पापग्रह से युत हो तो।।१४८।। विदेशवास दुःखार्ति मृत्युचौरादिपीडनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युभयं भवेत् ।।१४९।। विदेश में वास, दुःख, पीड़ा, मृत्यु, चौरादि से पीड़ा होती है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है।।१४९।। तद्दोषोपशान्त्यर्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् । श्वेतां गां रजतं दद्याच्छान्तिं प्राप्नोत्यसंशयः ।।१५०।। इस दोष के शान्त्यर्थ रुद्र जप, सफेद गौ, चाँदी का दान करने से निश्चय ही शान्ति प्राप्त होती है।।१५०।।