बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचारोध्यायः । ४६७ दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा । विवाहं यज्ञदीक्षां च दानधर्मशुभादिकम् ।।१३०।। दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ स्थान में वा धन स्थान में बुध हो तो विवाह यज्ञ, दीक्षा, दान, धर्म आदि शुभकार्य ।।१३०।। राजप्रीतिकरं चैव विद्वज्जन समागमम् । मुक्तामणिप्रवालानि वाहनाम्बरभूषणम् ।।१३१।। राजा से प्रेम, विद्वानों का समागम, मुक्ता, मणि, मूंगा, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है।।१३१।। आरोग्यप्रीतिसौख्यं च सोमपानादिकं सुखम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा नीचगेऽपि वा ।।१३२।। आरोग्यता, प्रसन्नता, सुख और सोमपान आदि का लाभ होता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में वा अपनी नीच राशि में बुध हो तो।।१३२।। तद्भुक्तौ देहबाधा च कृषिगोभूमिनाशनम् । कारागृहप्रवेशं च दारपुत्रादि पीडनम् ।।१३३।। उसके अन्तर में शरीर में बाधा, कृषि, गौ, भूमि का नाश जेल यात्रा, स्त्री पुत्र आदि को कष्ट होता है।।१३३।। द्वितीयद्यूननाथे च ज्वरपीडां महद्भयम् । छागदानं प्रकुर्वीत विष्णुसाहस्त्रकं जपेत् ।।१३४।। २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो ज्वर से पीड़ा और बड़ा भय होता है। शान्त्यर्थ बकरी का दान और विष्णु सहस्त्र नाम का जप कराना चाहिये।।१३४।। अथचन्द्रदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्- चन्द्रस्यान्तर्गते केतौ केन्द्रलाभ त्रिकोणगे । दुश्चिक्ये बलसंयुक्ते धनलाभं महत्सुखम् ।।१३५।। चन्द्रमा की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण में वा ३ रे भाव में बलवान् केतु के अन्तर में धन का लाभ, बड़ा सुख होता है।।१३५।। पुत्रदारादि सौख्यं च मित्रकर्म करोति च । भुक्त्यादौ धनहानिः स्यान्मध्यगे सुखमाप्नुयात् ।।१३६।। पुत्र, स्त्री को सुख, मित्रों के कार्य को करता है। अन्तर के आरम्भ में धन की हानि और मध्य में सुख होता है।।१३६।।