बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राज्यं लाभकारी कार्यों में संलग्न चतुष्पद जीवों का लाभ होता है योगकारक के स्थान में बलवान् केतु के रहने से॥२०३॥ पुत्रलाभो यशोवृद्धिर्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् । भृत्यवर्गधनप्राप्तिः सेनापत्यं महत्सुखम् ।।२०४।। पुत्र का लाभ, यश की वृद्धि, गृह में लक्ष्मी का प्रवेश, नौकरों द्वारा भी धन का लाभ॥२०४॥ भूपालमित्रं कुरुते यानाम्बर विभूषणम् । दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते ।।२०५।। राजा से मित्रता और यज्ञ आदि से वस्त्र आभूषण का लाभ होता है। दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो॥२०५॥ कलहो दन्तरोगश्च चौरव्याघ्रादिपीडनम् । ज्वरातिसारकुष्ठादिदारपुत्रादिपीडनम् ।।२०६।। कलह दांत में रोग, चोर व्याघ्र से पीड़ा होती है। ज्वरातिसार और कुष्ठ रोग होता है, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा होती है॥२०६॥ द्वितीयसप्तमस्थाने देहे व्याधिर्भविष्यति । सन्मानं धनसन्तापं धनधान्यस्य प्रच्युतिम् । मृत्युंजयं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।२०७।। २।७ स्थान में हो तो शरीर में व्याधि का भय, धन का संताप, धन-धान्य की हानि होती है। इसके शान्त्यर्थ भी सम्पत्ति को देने वाले मृत्युंजय मंत्र का जप कराना चाहिये॥२०७॥ अथभौमदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि शुभस्थानाधिपेऽथवा ।।२०८।। भौम की दशा में केन्द्र, लाभ, त्रिकोण वा अपने उच्च, अपनी राशि में गये हुये शुक्र के अन्तर में वा शुभ स्थान के स्वामी शुक्र के अन्तर में॥२०८॥ राज्यलाभं महत्सौख्यं गजाश्वाम्बरभूषणम् । लग्नाधिपेन सम्बन्धे पुत्रदारादिवर्धनम् ।।२०९।। राज्य का लाभ, बड़ा सुख, हाथी, घोड़ा, वस्त्र, आभूषण का सुख होता है। लग्नेश से संबन्ध करता हो तो पुत्र, स्त्री आदि की वृद्धि॥२०९॥