भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८७ षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये मन्दराशियुतेक्षिते । दायेशात्षष्ठरिःफे वा रंध्रे वा पापसंयुते ॥२६४॥ ६।८।१२ वें भाव में बुध हो और शनि की राशि में शनि से दृष्ट हो अथवा दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो ॥२६४॥ देवब्राह्मणनिन्दा च भोगभाग्यविहीनभाक् । सत्यहीनश्च दुर्बुद्धिश्चौराहिनृपपीडनम् ॥२६५॥ देवता-ब्राह्मण की निन्दा, भोगादि से विहीन, सत्य से हीन, दुर्बुद्धि का उदय, चोर, सर्प राजा से पीड़ा होती है॥२६५॥ अकस्मात्कलहश्चैव गुरुपुत्रादि नाशनम् । अर्थव्ययो राजकोपो दारपुत्रादिपीडनम् ॥२६६॥ अकस्मात् कलह, गुरु पुत्र आदि का नाश, होता है। द्रव्य का व्यय, राजा का कोप, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा होता है॥२६६॥ द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युं तयाऽश्रियम् । तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् । स्वगृह्योक्तविधानेन शान्तिं कुर्याद्विचक्षणः ॥२६७॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु और दरिद्रता होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ विष्णुसहस्र नाम का जप और अपने शाखा के अनुसार शान्ति करना चाहिये॥२६७॥ अथराहुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते केतौ भ्रमणं राजकृद्धनम् । वातज्वरादिरोगश्च चतुष्पाज्जीवहानिकृद् ॥२६८॥ राहु की दशा में केतु की अन्तर्दशा में भ्रमण और राजा से धन प्राप्ति और वातज्वर आदि रोग, चतुष्पदजीवों की हानि होती है॥२६८॥ अष्टमाधिपसंयुक्ते देहजाड्यं मनोरुजम् । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे देहसौख्यं धनागमः ॥२६९॥ अष्टमेश से युत हो तो शरीर में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है। शुभग्रह से युत और दृष्ट हो तो सुख और धन का लाभ होता है॥२६९॥