बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राजसन्मानभूप्राप्तिर्गृहे शुभकरो भवेत् । लग्नाधिपेन सम्बन्धे इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥२७०॥ राजा से सन्मान, धन, भूमि का लाभ और गृह में शुभ कार्य होंगे लग्नेश हो सम्बंध होने से इष्ट सिद्धि होती है॥२७०॥ लग्नाधिपसमायुक्ते लाभोवा भवति ध्रुवम् । चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्केन्द्रे वाथ त्रिकोणगे ॥२७१॥ लग्नेश से सम्बन्ध हो तो अभीष्ट की सिद्धि और सुख होता है। यदि लग्नेश से युत हो तो धन का लाभ होता है। केन्द्र त्रिकोण में रहने से चतुष्पद का लाभ होता है॥२७१॥ रन्ध्रस्थानगते केतौ व्यये वा वलवर्जित । तद्भुक्तौ बहुरोगः स्याच्चौराग्निव्रणपीडनम् ॥२७२॥ ८।१२ स्थान में निर्बल केतु हो तो उसके अन्तर में अनेक रोग, चोर, अग्नि और फोड़ा से पीड़ा॥२७२॥ पितृमातृवियोगश्च भ्रातृद्वेषं मनोरुजम् । स्वप्रभोश्च महाकष्टं वैषम्यं चित्तहिंसकम् ॥२७३॥ पिता माता से वियोग, भाई से द्वेष, मानसिक कष्ट होता है और अपने मालिक से बैर और उससे कष्ट होता है॥२७३॥ द्वितीयद्युनाथे तु देहवाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं छागदानं च कारयेत् ॥२७४॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में बाधा होती है। इसके शान्त्यर्थ बकरी का दान करना चाहिये॥२७४॥ अथराहुदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते शुक्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । लाभे वा वलसंयुक्ते योगप्रावल्यमादिशेत् ॥२७५॥ राहु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा एकादश स्थान में बलवान शुक्र हो तो प्रबल योग होता है॥२७५॥ विप्रमूलाद्धनप्राप्तिर्गोमहिष्यादिलाभकृत् । पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणसम्भवम् ॥२७६॥ इसके अन्तर में ब्राह्मण द्वारा धन का लाभ, गौ भैंस का लाभ, पुत्रोत्सव, गृह में कल्याण॥२७६॥