बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । लाभे वा धर्मराशिस्थे क्षेत्रपालान्महत्सुखम् । सुगंधवस्त्रशय्यादिं गानविद्यापरिश्रमम् ॥२८५॥ लाभ या नवम भाव में शुक्र हो तो क्षेत्रपाल से सुख होता है॥२८५॥ छत्रचामरवाद्यादिगंधपद्मसन्वितम् । दायेशाद्रिपुरंध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ॥२८६॥ और छत्र, चामर, बाजा आदि गंधादि से युक्त होता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रहं से मुत शुक्र हो तो॥२८६॥ विषाहिनृपचौरादिमूत्रकृच्छ्रकान्महद्भयम् । प्रमेहाद्रुधिरं रोग कुत्सितान्नं शिरोरुजम् ॥२८७॥ उसके अन्तर में विष-सर्प-राजा-चोर आदि से तथा कृच्छ्र (सुजाक) रोग से भय होता है। प्रमेह से रक्त का रोग और खराब अन्न का भोजन तथा शिर में रोग होता है॥२८७॥ कारागृहप्रवेशं च राजदंडाद्धनक्षयम् । द्वितीयद्यूननाथे वा दारपुत्रादिनाशनम् ॥२८८॥ कारागाह (जेल) में प्रवेश, स्त्री पुत्रादि का नाश होता है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥२८८॥ आत्मपीडा भयं चैवाह्यपमृत्युस्तथाभवेत् । दुर्गालक्ष्मीजपं कुर्यान्मृत्युनाशकरो भवेत् ॥२८९॥ दुर्गा और लक्ष्मी का जय करने से मृत्यु का नाश होकर सुख होता है॥२८९॥ अथराहुदशायां सूर्यान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । त्रिकोणे लाभगे वापि तुंगांशेस्वांशमेऽपिवा ॥२९०॥ राहु की दशा में अपने उच्च में वा अपनी राशि में केन्द्र त्रिकोण, ग्यारहवें वा अपने उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये॥२९०॥ शुभग्रहेण संदृष्टे राजप्रीतिकरं शुभम् । धनधान्यसमृद्धिश्च ह्यल्पसौख्यं सुखावहम् ॥२९१॥ शुभग्रह से देखे जाते हुये सूर्य के अन्तर में राजा से प्रेम, धन धान्य समृद्धि की प्राप्ति, अल्पसुख॥२९१॥