भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथान्नर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९१ अल्पग्रामाधिपत्यं च स्वल्पलाभो भविष्यति । भाग्यलग्नेशसंयुक्ते कर्मेशेन निरीक्षिते ॥२९२॥ छोटे ग्राम का आधिपत्य, अल्पलाभ होता है। भाग्येश और लग्नेश से युक्त हो और कर्मेश से देखा जाता हो तो॥२९२॥ राजाश्रयो महत्कीर्त्तिर्विदेशगमनं महत् । देशाधिपत्ययोगं च गजाश्वाम्बरभूषणम् ॥२९३॥ राजा से आश्रय की प्राप्ति, बड़ा यश, विदेशयात्रा होती है। यह देश का अधिपति योग होता है. इसमें ग्राम का अधिकार हाथी, घोड़ा वस्त्र आभूषण की प्राप्ति॥२९३॥ मनोभीष्टप्रदानं च पुत्रकल्याणसम्भवम् । दायेशाद्विःफरन्ध्रस्थे षष्ठे वा नीचगेऽपि वा ॥२९४॥ मन के अनुकूल इष्टसिद्धि, पुत्र के लाभ का सम्भव होता है यदि दशेश १२।८।६ स्थान में सूर्य हों वा नीच राशि में हों तो॥२९४॥ ज्वरातिसाररोगं च कलहंराजविद्विषम् । प्रयाणं शत्रुवृद्धिश्च नृपचौराग्निपीडनम् ॥२९५॥ ज्वरातिसार रोग, कलह, राजा से विद्वेष, यात्रा, शत्रुओं की वृद्धि, राजा चोर अग्नि से पीड़ा होती है॥२९५॥ दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा । विदेशे राजसन्मानं कल्याणं च शुभावहम् ॥२९६॥ दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो तो विदेश में राजा से सम्मान, कल्याण और शुभ होता है॥२९६॥ द्वितीयद्यूननाथेतु महारोगो भविष्यति । सूर्यप्रसन्नशान्ति च कुर्यादारोग्यसम्भवम् ॥२९७॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो महारोग होता है। सूर्य की प्रसन्नता की शान्ति करने से आरोग्यता होती है॥२९७॥ अथराहुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते चन्द्रे स्वक्षेत्रे स्वर्क्षगेऽपि वा । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मित्रर्क्षे शुभसंयुते ॥२९८॥ राहु की दशा में अपनी राशि, उच्चराशि में केन्द्रत्रिकोण, वा लाभ में वा मित्र की राशि में शुभग्रह से युत चन्द्रमा हो तो उसके अन्तर में॥२९८॥