भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 502

५०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । गुरु की दशा में अपनी उच्चराशि में वा केन्द्र में वा मूलत्रिकोण वा भाग्य में केन्द्रेश से युत वा ।।७१।। शुभयुक्तैक्षिते वापि योगप्रीतिं समादिशेत् । भुक्त्यादौ शरमासांश्च धनधान्य परिश्रमम् ।।७२।। शुभग्रह से युक्त दृष्ट राहु के अन्तर में योग की प्रखरता होती है, अन्तर के आदि में ५ मास धन-धान्य और परिश्रम ।।७२।। देशग्रामाधिकारं च यवनप्रभुदर्शनम् । गृहे कल्याणसम्पत्तिर्बहुसेनाधिपत्यताम् ।।७३।। देश-ग्राम की स्वामिता, यवन राजा का दर्शन, गृह में कल्याण कार्य, सम्पत्ति की प्राप्ति और अनेक अधिकार ।।७३।। दूरयात्राभिगमनं पुण्यधर्मादिसंग्रहः । सेतुस्नानफलावाप्तिरिष्टसिद्धिसुखावहम् ।।७४।। दूर की यात्रा, पुण्य-धर्म आदि का संग्रह, समुद्र स्नान का लाभ और सुखकर इष्टसिद्धि होती है।।७४।। दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते । चौरादिब्रणभीतिश्च राजवैषम्यमेव च ।।७५।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो चौर आदि से तथा ब्रण से भय, राज से विरोध ।।७५।। गृहे कर्मकलापने व्याकुलो भवति ध्रुवम् । सोदरेण विरोधः स्याद्दायादजनविग्रहम् ।।७६।। गृह में कर्म कलाप से व्याकुलता, पुत्र से विरोध दायादों से विग्रह ।।७६।। गृहेत्वशुभकार्याणि दुःस्वप्नादिभयं ध्रुवम् । अकस्मात्कलहश्चैव क्षुद्रशून्यादिरोगकृत् ।।७७।। घर में अशुभ कार्य, दुःस्वप्न से भय, अकस्मात् कलह, क्षुद्र, लकवा आदि रोग का भय होता है।।७७।। द्विसप्तमस्थिते राहौ देहबाधां विनिर्दिशेत् । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजय जपं चरेत् । छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसौख्यादिमादिशेत् ।।७८।।