बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 503, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५०५ २ वा ७ भाव में हो तो शरीर बाधा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ मृत्युंजय का जप और बकरी का दान करने से सभी सुख की प्राप्ति होती है।।७८।। इति गुर्वन्तर्दशाफलम्। अथशनिदशायांशन्यन्तर्दशाफलम्- मूलत्रिकोण स्वक्षें वा तुलायामुच्चगेऽपिवा । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा राजयोगादिसंयुते ।।१।। शनि की दशा में अपने मूलत्रिकोण, अपनी राशि, तुला राशि में परमोच्च में केन्द्र त्रिकोण वा लाभ में गये राजयोग से पूर्ण शनि के अन्तर में।।१।। राज्यलाभं महत्सौख्यं दारपुत्रादिवर्धनम् । वाहनत्रयसंयुक्तं गजाश्वाम्बरसंकुलम् ।।२।। राज्य का लाभ, अधिक सुख, स्त्री पुत्र आदि की वृद्धि होती है। तीनों वाहनों का सुख, घोड़ा हाथी वस्त्र का सुख होता है।।२।। महाराजप्रसादेन अश्वदौत्यादिलाभकृत् । चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।।३।। महाराजा के प्रसाद से घोड़ा सवारी और दूत का लाभ, चौपाये-जीव का लाभ और ग्राम तथा भूमि का लाभ होता है।।३।। षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वा पापसंयुते । तद्भुक्त्यादौ राजप्रीतिर्विषशस्त्रादिपीडनम् ।।४।। यदि शनि ६।८।१२ भाव में वा अपनी नीच राशि में पापग्रह से युत हो तो, अन्तर में राजा से प्रेम, विष-शस्त्र आदि से पीड़ा।।४।। रक्तस्रावं गुल्मरोगतिसारादिपीडनम् । मध्ये चौरादिभीतिश्च देशत्यागं मनोरुजम् ।।५।। रक्त स्राव, गुल्मरोग, अतिसार से पीड़ा होती है। अन्तर के मध्य में चौरआदि से भय, देशत्याग, मानसिक कष्ट।।५।। अंते शुभकरं चैव ग्रामभूम्यादिलाभकृत् । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोष परिहारार्थ मृत्युंजय जपं चरेत् ।।६।।