बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५०९ शनिचारान्मनुष्योऽसौ योगमाप्नोत्यसंशयम् । दायेशाद्भाग्यगेनैव केन्द्रे वा लाभसंयुते ॥२६॥ और शनि के संचार होने से निःसंशय योग को पाता है। दशेश से भाग्य - वा केन्द्र वा लाभ में हो तो॥२६॥ राज्यप्रीतिकरं चैव मनोभीष्टप्रदायकम् । दानधर्मदयायुक्तस्तीर्थयात्रादिकं फलम् ॥२७॥ मनोनुकूल अभीष्ट की सिद्धि होती है। दान धर्म दया से युक्त हो तीर्थ यात्रा आदि करता है॥२७॥ शास्त्रार्थकाव्यरचनां वेदांतश्रवणादिकम् । दारपुत्रादिसौख्यं च वाहनछत्रलाभदम् ॥२८॥ शास्त्रार्थ और काव्य रचना और वेदांत को सुनता है। स्त्री पुत्र आदि का सुख और वाहन छत्र आदि का लाभ होता है॥२८॥ शत्रुनीचास्तगे शुक्रे षष्ठाष्टव्ययराशिगे । दारनाशं मनःक्लेशं स्थाननाशं मनोरुजम् ॥२९॥ यदि शुक्र शत्रु राशि वा नीचराशि वा ६।८।१२ भाव में हो तो स्त्री का नाश, मन को कष्ट, स्थान का नाश, मन में कष्ट॥२९॥ दारनाशं स्वजनक्लेशः सन्तापो जनविग्रहः । दायेशाद्व्ययगेशुक्रे षष्ठे वाह्यष्टमेऽपिवा ॥३०॥ स्वजनों को कष्ट सन्ताप, जनसमूह से वैर होता है। दशेश से बारहें वा छठें वा आठवें भाव में शुक्र हो तो॥३०॥ नेत्रपीडाज्वरभयं स्वकुलाचारवर्जितः । कपोले दन्तशूलादि हृदिगुह्ये च पीडनम् ॥३१॥ नेत्र में पीड़ा, ज्वर, भय, आचारभ्रष्ट, कपोल तथा दांत में पीड़ा और हृदय तथा गुह्य स्थान में पीड़ा॥३१॥ जलभीतिर्मनस्तापो वृक्षात्पतनसम्भवः । राजद्वारे जयद्वेषः सोदरेण विरोधनम् ॥३२॥ जल से भय, मन में संताप, वृक्ष से गिरने की संभावना, राजद्वार में विजय होने से द्वेष अपने भाइयों से विरोध होता है॥३२॥