बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । द्वितीयसप्तमाधीशो आत्मक्लेशो भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादिव्याजपंचरेत् । श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धिदम् ।।३३।। यदि २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो आत्मा को कष्ट होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गादेवी का जप करना चाहिये और सफेद गौ, भैंस का दान करने से आयु, आरोग्यता की प्राप्ति होती है।।३३।। अथशनिदशायां सूर्यान्तर्दशाफलम्- मन्दस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा । भाग्याधिपेन संयुक्ते केन्द्रलाभत्रिकोणके ।।३४।। शनि की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में भाग्येश युक्त अथवा केन्द्र लाभ-त्रिकोण में।।३४।। शुभदृष्टियुते वापि स्वप्रभोश्च महत्सुखम् । गृहे कल्याणसम्पत्तिः पुत्रादि सुखबर्धनम् ।।३५।। शुभग्रह से दृष्ट युत सूर्य के अन्तर में अपने मालिक से सुख गृह में कल्याण और सम्पत्ति, पुत्र आदि के सुख की वृद्धि।।३५।। वाहनाम्बरपश्वादिगोक्षीरैः संकुलं गृहम् । षष्ठाष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वा तथैव च ।।३६।। वाहन-वस्त्र पशु आदि की वृद्धि और गौ के दूध से घर भरा रहता है यदि सूर्य लग्न वा दशेशं ६।८।१२ भाव में हो तो।।३६।। हृद्रोगो मानहानिश्च स्थानभ्रंशो मनोरुजा । इष्टबंधुवियोगश्च उद्योगस्य विनाशनम् ।।३७।। हृदय का रोग मानहानि, स्थान हानि, मानसिक कष्ट, इष्ट बन्धु का वियोग, उद्योग (व्यवसाय) की हानि।।३७।। तापज्वरादिपीडा च व्याकुलत्वं भयं तथा । आत्मसम्बन्धिमरणमिष्टबन्धुवियागकृत् ।।३८।। तापज्वर से पीड़ा, व्याकुलता और भय होता है आत्मीय सम्बंधि का मृत्यु, प्रियबन्धु का वियोग होता है।।३८।। द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं सूर्यपूजां च कारयेत् ।।३९।।