भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 800 में से

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पृष्ठ 509

अथान्तर्दशादिफलविचारोध्यायः । ५११ २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर बाधा होती है। इसके शान्त्यर्थ सूर्य की पूजा करनी चाहिये।।३६-३९।। अथशनिदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् - मन्दस्यान्तर्गते चन्द्रे जीवदृष्टि समन्विते । स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रस्थेत्रिकोणेलाभगेऽपि वा ।।४०।। शनि की दशा में गुरु की दृष्टि से युक्त अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र- त्रिकोण वा लाभ में।।४०।। पूर्णचन्द्रे सौम्ययुक्ते राजप्रीति समागमम् । महाराजप्रसादेन वाहनाम्बर भूषणम् ।।४१।। पूर्णचन्द्र शुभग्रह से युत हो तो इसके अन्तर में राजा से प्रेम और समागम होता है। महाराजा की प्रसन्नता से वाहन वस्त्र आभूषण।।४१।। सौभाग्यं सुखवृद्धिं च भृत्योश्च परिपालनम् । पितृमातृकुले सौख्यं पशुवृद्धिः सुखावहा ।।४२।। सौभाग्य, सुख में वृद्धि, भृत्यों का पालन, पिता-माता के कुल में सुख देने वाली पशु वृद्धि होती है।।४२।। दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे लाभगेऽपिवा । वाहनाम्बरपश्वादि भ्रातृवृद्धिः सुखावहा ।।४३।। दशेश से केन्द्र राशि में वा त्रिकोण में वा लाभ स्थान में हो तो वाहन, वस्त्र, पशु, भाई की वृद्धि सुखद होती है।।४३।। पितृमातृसुखावाप्तिः स्त्रीसौख्यं च धनागमम् । मित्रप्रभुवशादिष्टं सर्वसौख्यं शुभावहम् ।।४४।। पिता-माता के सुख की प्राप्ति, स्त्री का सुख, धन का आगम, मित्र और स्वामी की कृपा से इष्ट सिद्धि, और सभी कल्याण देने वाले सुख होते हैं।।४४।। क्षीणो वा पापसंयुक्ते पापदृष्टौ विनीचंगे । क्रूरांशकगते वापि क्रूरक्षेत्रगतेऽपि वा ।।४५।। यदि चन्द्रमा क्षीण वा पापग्रह से युक्त पापग्रह दृष्टा वा नीचराशि में हो अथवा क्रूरग्रह के अंश में वा क्रूरग्रह की राशि में हो तो।।४५।। जातकस्य महत्कष्टं राजकोपाद्धनक्षयः । पितृमातृवियोगश्च पुत्रीपुत्रादिरोगकृत् ।।४६।।