बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । जातक को महाकष्ट, राजक्रोप से धन का नाश पिता माता से वियोग, पुत्रादि को रोग होता है।।४६।। व्यवसायात्फलं नेष्टं नानामार्गे धनव्ययम् । अकाले भोजनं चैवौषधस्य च भक्षणम् ।।४७।। व्यवसाय में हानि, अनेक कार्यों में धनव्यय, कुसमय में भोजन, औषध सेवन, होता है।।४७।। फलाधिक्याद्विवादं च आदौ सौख्यं धनागमम् । दायेशात्षष्ठरिष्फे वा रन्ध्रे वा बलवर्जिते ।।४८।। कला अधिक होने से विवाद, प्रथम धन का आगम और सुख होता है। दशेश से ६।१२।८ भाव में निर्बल हो।।४८।। शयनं रोगमालस्यं स्थानभ्रष्टं सुखावहम् । शत्रुवृद्धिर्विरोधं च इष्टबन्धुवियोगकृत् ।।४९।। अधिक निद्रा, आलस्य स्थान की हानि, सुख, शत्रु वृद्धि, विरोध, और अभीष्ट बंधुका वियोग होता है।।४९।। द्वितीयद्यूननाथे तु देहालस्यो भविष्यति । तद्दोषशमनार्थं च तिलहोमादिकं चरेत् ।।५०।। २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में अधिक आलस्य होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ तिल का हवन आदि करना चाहिये।।५०।। गुडं घृतं च दघ्नाक्तं तांडुलं च यथाविधि । श्वेतां गां महिषीं दद्याद्यायुरारोग्य वृद्धिकृत् ।।५१।। गुड़, घी, दही मिला हुआ चावल, सफेद गौ, भैंस को यथाविधि दान करने से आयु, आरोग्यता की प्राप्ति होती है।।५१।। अथशनिदशायांभौमान्तर्दशाफलम्- मन्दस्यान्तर्गते भौमे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । तुङ्गे स्वक्षेत्रगे वापि दशाधिपसमन्विते ।।५२।। शनि की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण वा उच्च वा स्वराशि में दशेश वा।।५२।। लग्नाधिपेन संयुक्ते आदौ सौख्यं धनागमम् । राजप्रीतिकरं सौख्यं वाहनाम्बरभूषणम् ।।५३।।