बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः ॥ ५१३ लग्नेश से युक्त भौम के अन्तर में पहले सुख, धन का आगम, राजा से प्रीति, सुख, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है॥५३॥ सेनाधिपत्यं नृपप्रीतिः कृषिगोधान्यसंग्रहः । नूतनस्थाननिर्माणं भ्रातृवर्गेष्टसौख्यकृत् ॥५४॥ सेनाधिपति का अधिकार, राजा से प्रेम, कृषि गौ धान्य का संग्रह, नवीन स्थान का निर्माण, भाइयों से अभीष्ट सुख का लाभ होता है॥५४॥ नीचे चास्तंगते भौमे षष्ठाष्टव्ययराशिगे । पापद्दष्टियुते वापि धनहानिर्भविष्यति ॥५५॥ यदि भौम अपने नीच में वा अस्त हो वा ६।८।१२ भाव में हो तो धन की हानि होती है॥५५॥ चौराहिब्रणशस्त्रादिग्रंथिरोगादिपीडनम् । भ्रातृपुत्रादिपीडा च दायादजनविग्रहम् ॥५६॥ चोर-सर्प-फोड़ा, हथियार, ग्रंथि रोगादि से पीड़ा होती है, भाई पुत्र को पीड़ा, दायादों से विग्रह॥५६॥ चतुष्पाज्जीवहानिश्च कुत्सितान्नस्यभोजनम् । विदेशगमनं चैव नानामार्गे धनव्ययः ॥५७॥ चौपाये जानवर की हानि, खराब अन्न का भोजन, विदेश यात्रा, अनेक प्रकार से धन व्यय होता है॥५७॥ अष्टमद्यूननाथे तु द्वितीयस्थेऽथवायदि । अपमृत्युभयं चैव नानाकष्टपराभवम् ॥५८॥ आठवें वा दूसरे भाव का स्वामी हो तो अनेक कष्ट और पराभव होता है॥५८॥ तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिहोमं च कारयेत् । अनड्वाहं प्रकुर्वीत सर्वारिष्ट प्रशान्तये ॥५९॥ इस दोष के शान्त्यर्थ शान्ति और हवन करना चाहिये। और सभी अरिष्टों के शान्त्यर्थ बैल का दान करना चाहिये॥५९॥ अथशनिदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् – मन्दस्यान्तर्भते राहौ कलहश्च मनोव्यथा । देहपीडा मनस्तापः पुत्रद्वेषो मनोरूजः ॥६०॥