बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । शनि की दशा में राहु की अन्तर्दशा में कलह, मानसिक कष्ट, शरीर में पीड़ा, मन में सन्ताप, पुत्र से द्वेष, मन में पीड़ा॥६०॥ अर्थव्ययं राजभयं स्वजनादि ह्युपद्रवम् । विदेशगमनं चैव गृहक्षेत्रादिनाशनम् ॥६१॥ धन का व्यय, राजभय, आपस के लोगों का उपद्रव, विदेश यात्रा और गृह क्षेत्र आदि का विनाश होता है॥६१॥ लग्नाधिपेन संयुक्ते योगकारकसंयुते । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे केन्द्रे दायेशाल्लाभराशिमे ॥६२॥ यदि राहु लग्नेश से वा योगकारक से युत हो तो अपने उच्च, अपने क्षेत्र, केन्द्र में वा दशेश से लाभ स्थान में हो॥६२॥ आदौ सौख्यं धनावाप्तिं गृहक्षेत्रादिसंपदम् । देवब्राह्मणभक्तिं च तीर्थयात्रादिकं लभेत् ॥६३॥ आदि में सुख धन का लाभ, गृह क्षेत्र आदि का सुख, देवता, ब्राह्मण की भक्ति, तीर्थ यात्रा आदि का लाभ॥६३॥ चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्गृहे कल्याणवर्धनम् । मध्ये तु राजभीतिश्च पुत्रमित्र विरोधनम् ॥६४॥ चतुष्पद जीव का लाभ, गृह में कल्याण की वृद्धि होती है। मध्य में राजभय, पुत्रमित्र आदि से विरोध होता है॥६४॥ मेषादौ कन्यकां चैव कुलीरे वृषभेतथा । मीनकोदंडसिंहेषु गजांतैश्वर्यमादिशेत् ॥६५॥ मेष-कन्या, कर्क, वृष, मीन, धन सिंह राशि में हो तो गजांत ऐश्वर्य का लाभ॥६५॥ राजसन्मानभूषाप्तिं मृदुलाम्बरसौख्यकृत् । द्विसप्तमाधिपैर्युक्ते देहबाधाभविष्यति ॥६६॥ राजा से सन्मान, आभूषण का लाभ, कोमल वस्त्र से सुख होता है। यदि दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी से युक्त हो तो शरीर में बाधा होने की सम्भावना होती है॥६६॥ मृत्युंजय प्रकुर्वीत छागदानं च कारयेत् । अनड्वाहं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥६७॥