बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५१७ पापयुक्तेऽथवा दृष्टे धनधान्यपशुक्षयम् । आत्मबन्धुविरोधं च शूलरोगादिसम्भवम् ॥३॥ पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो धन धान्य पशु का नाश, आत्मीय बन्धु से विरोध, शूलरोगादि की सम्भावना॥३॥ राजकार्यकलापेन व्याकुलो भवति ध्रुवम् । द्वितीयद्यूननाथे तु दारक्लेशो भविष्यति ॥४॥ और राजकार्य के सम्बन्ध से व्याकुलता होती है। २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो स्त्री को कष्ट॥४॥ आत्मसंबन्धिमरणं वातशूलादिसम्भवम् । तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ॥५॥ आत्मीय सम्बन्धी की मृत्यु औरै बातशूलादि रोगों की सम्भावना होती है। इस दोष की शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम का जप करना चाहिये॥५॥ बुधस्यान्तर्गते केतौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नाधिपसमन्विते ॥६॥ बुध की दशां में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट वा लग्नेश से युक्त॥६॥ यीगकारकसम्वन्धे दायेशात्केन्द्रलाभगे । देहसौख्यं धनाल्पत्वं बन्धुस्नेहसहायकृत् ॥७॥ वा योगकारक से सम्बन्ध करते हुये दशेश से केन्द्र वा लाभ भाव में स्थित केतु के अन्तर में देह का सुख, धन की अल्पता, बन्धुओं का स्नेह और सहायता॥७॥ चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्संसारे देहसौख्यभाक् । विद्याकीर्त्तिप्रसंगश्च समानप्रभुदर्शनम् ॥८॥ चतुष्पद जीव का लाभ, देह सुखं, विद्या, और यश का प्रसंग अपने समान स्वामी का दर्शन॥८॥ भोजनाम्बरसौख्यं च ह्यादौ मध्ये सुखावहम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्ययेवा पापसंयुते ॥९॥ भोजन-वस्त्र, सुख पहले होता है मध्य में सुख होता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो॥९॥