बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५१९ हृद्रोगो मानहानिश्च ज्वरातीसारपीडनम् । आत्मबन्धुवियोगश्च संसारे देहनिष्प्रभम् ।।१७।। हृदय का रोग, मानहानि, ज्वर अतिसार की पीड़ा, आत्मीय बन्धु का वियोग, संसार से विरूपता।।१७।। आत्मक्लेशं मनस्तापमापदादि विपत्तयः । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवी जपं चरेत् ।।१८।। अपने को क्लेश, मनमें संताप आदि विपत्तियाँ होती हैं। दूसरे वा सातवें भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गा देवी का जप कराना चाहिये।।१८।। अथ बुधदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्- सौम्यस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । त्रिकोणे धनलाभेषु तुङ्गांशे स्वांशगेऽपिवा ।।१९।। बुध की दशा में अपनी उच्च, अपनी राशि, त्रिकोण वा धन वा लाभ वा उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये सूर्य के अन्तर में।।१९।। राजप्रसादसौभाग्यं मित्रप्रभुवशात्सुखम् । भूम्यात्मजेन संदृष्टे आदौ भूलाभमेव च ।।२०।। राजा की प्रसन्नता का सौभाग्य, मित्र और स्वामी के द्वारा महासुख का लाभ होता है। भौम से देखा जाता हो तो प्रथम भूमि का लाभ होता है।।२०।। लग्नाधिपेन संदृष्टे बहुसौख्यं धनागमम् । ग्रामभूम्यादिलाभं च भोजनाम्बरसौख्यकृत् ।।२१।। लग्नेश से दृष्ट हो तो बहुत सुख और धन का आगम, ग्राम, भूमि का लाभ और भोजन वस्त्र का सुख होता है।।२१।। षष्ठाष्टमव्यये वापि शन्यरफणिसंयुते । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ।।२२।। यदि सूर्य ६।८।१२ भाव में शनि भौम राहु से युत हो वा दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल होतो।।२२।। चौराग्निशस्त्रपीडा च पित्ताधिक्यं भविष्यति । शिरोरूङ्मनसस्तापं इष्टबंधु वियोगकृत् ।।२३।।