बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५३७ राजकर्मचारियों से विरोध, परगृहवास, वाहन, वस्त्र पशु आदि धन-धान्य का नाश होता है।।७२।। भुक्त्यादौ शोभनम् प्रोक्तं मध्ये सौख्यं धनागमम् । अन्तेक्लेशकरचैव दारपुत्रादिपीडनम् ।।७३।। अन्तर के आदि में शुभफल, मध्य में सुख और धन का आगम और अन्त में क्लेश, स्त्री-पुत्र को पीड़ा होती है।।७३।। दायेशात्षष्ठरन्ध्रे व्यये वा बलवर्जिते । तद्भुक्त्यादौ महाक्लेशो दारपुत्रादिपीडनम् ।।७४।। दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो तो अन्तर के आरम्भ में महाकष्ट स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा।।७४।। राजभीतिकरं चव मध्ये तीर्थकरं भवेत् । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकंजपेत् ।।७५।। और राजभय तथा मध्य में तीर्थयात्रा होती है। दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी हों तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष की शान्ति के लिये विष्णु सहस्त्र नाम का जप करना चाहिये।।७५।। इति केतुदशायामन्तर्दशाफलम्। अथशुक्रदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्– भृगोरन्तर्गते शुक्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । लाभे वा वलसंयुक्ते योगप्राबल्यमादिशेत् ।।१।। शुक्र की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में बली शुक्र हो तो योग की प्रबलता होती है।।१।। विप्रमूलाद्धनप्राप्तिर्गोमहिष्यादिलाभकृत् । पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणसम्भवम् ।।२।। ऐसे शुक्र के अन्तर में ब्राह्मण द्वारा धन का लाभ और गौ-भैंस का लाभ होता. हैं। पुत्रोत्सव और कल्याण होता है।।२।। सन्मानं राजसन्मानं राज्यलाभो महत्सुखम् । स्वोच्चे वा स्वक्षेत्रे वापि तुङ्गांशे स्वांशगेऽपिवा ।।३।।