भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 536

५३८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सन्मान और राजा से सम्मान राज्य का लाभ और महा सुख होता है। यदि शुक्र अपने उच्च वा अपनी राशि में वा उच्चांश वा अपने नवांश में हो तो ।। ३ ।। नूतनालयनिर्माणं नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् । अन्नदानं प्रियं नित्यं दानधर्मादिसंग्रहः ।। ४ ।। नवीन गृह का निर्माण, नित्य मिष्ठान्न का भोजन, स्त्री पुत्र का लाभ मित्र के साथ भोजन, अन्नदान, नित्य दान धन का संग्रह ।। ४ ।। महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।। ५ ।। और महाराज की प्रसन्नता से वाहन-वस्त्र आभूषण का लाभ और व्यवसाय से अधिक लाभ, चतुष्प जीव का लाभ ।। ५ ।। प्रयाणं पश्चिमेभागे वाहनाम्बरलाभकृत् । लग्नाद्युपचये शुक्रे शुभदृष्टियुतेक्षिते ।। ६ ।। पश्चिम दिशा की यात्रा से वाहन, वस्त्र आदि का लाभ होता है। यदि शुक्र लग्न से उपचय (३।६।१०।११) भाव में शुभग्रह से युत दृष्ट ।। ६ ।। मित्रांशे तुङ्गलाभेशयोगकारक संयुते । राज्यलाभो महोत्साहो राजप्रीतिः शुभावहा ।। ७ ।। अपने मित्र के नवांश, वा उच्च में लाभेश और योग कारक से युत हो तो राज्य का लाभ, महा उत्साह, राजा से प्रीति ।। ७ ।। षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे पापयुक्तेऽथवीक्षिते ।। ८ ।। चोरादिव्रणभीतिश्च सर्वत्र जनपीडनम् । गृह में कल्याण सम्पत्ति स्त्री पुत्र आदि की वृद्धि होती है। यदि शुक्र ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युक्त और दृष्ट हो तो ।। ८ ।। राजद्वारे जनद्वेष इष्टबन्धु विनाशनम् ।। ९ ।। दारपुत्रादिपीडाच सर्वत्रजनपीडनम् । चोर आदि एवं व्रण का भय सर्वत्र जनपीड़ा, राजकीय पुरुषों से द्वेष, इष्टबन्धु का नाश, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा होती है ।। ९ ।। द्वितीय द्यूननाथे तु स्थिते चेन्मरणं भवेत् । शक्तौ दुर्गाजपं कुर्याद्धेनु दानं वा कारयेत् ।। १० ।।