बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५३९ २ वा ७ भाव के स्वामी हों तो मृत्यु होती है। अनिष्ट शान्त्यर्थ दुर्गा का जप और गोदान करना चाहिये।।१०।। अथशुक्रदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्- शुक्रस्यानागते सूर्ये संतापं राजविद्विषम् । दायादकलहं चैव व्यवहारमथापि वा ।।११।। शुक्र की दशा में सूर्य के अन्तर में संताप, राजा से शत्रुता, दायाद से कलह, वा व्यवहार होता है।।११।। स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे सूर्ये मित्रर्क्षे केन्द्रकोणगे । दायेशात्केन्द्रकोणेवा लाभे वा धनगेऽपिवा ।।१२।। यदि अपने उच्च, अपनी राशि वा मित्र की राशि वा केन्द्र वा त्रिकोण में हो अथवा दशेश से केन्द्र व कोण वा लाभ वा धन स्थान में हो, तो।।१२।। तद्भुक्तौ धनलाभः स्याद्द्रव्यस्त्री धन सम्पदः । स्वप्रभोश्च महत्सौख्यमिष्टबन्धु समागमः ।।१३।। धन का लाभ में हो तो राज्य स्त्री धन सम्पत्ति का लाभ, अपने स्वामी से सुख, मित्र-बन्धु का समागम।।१३।। पितृमात्रोः सुखप्राप्तिं भ्रातृलाभं सुखावहम् । सत्कीर्त्तिं सुखसौभाग्यं पुत्रलाभं च विंदति ।।१४।। पिता-माता के सुख का लाभ और भाई के लाभ से सुख होता है। अच्छी कीर्त्ति से सुख-सौभाग्य और पुत्र का लाभ होता है।।१४।। षष्ठाष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वातथैव च । नीचे वा पापवर्गस्थे देहतापं मनोरुजम् ।।१५।। यदि सूर्य ६।८।१२ भाव में हो वा दशेश से भी ऐसा ही हो, नीच राशि में पापग्रह के षड्वर्ग में हो तो शरीर में ताप, मानसिक कष्ट।।१५।। स्वजनस्यापिसंक्लेशो नित्यं निष्ठुरभाषणम् । पितृपीडा बंधुहानी राजद्वारे विरोधकृत् ।।१६।। आत्मीयलोगों को कष्ट नित्य निष्ठुर भाषण, पिता को कष्ट, बन्धु की हानि, राजा से शत्रुता।।१६।। व्रणपीडाहिबाधा च स्वगृहे च भयं तथा । नानारोगभयं चैव गृहक्षेत्रादिनाशनम् ।।१७।।