भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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५५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्य की दशा में केतु के प्रत्यन्तर में प्राण का भय, बड़ी हानि, राजभय, शत्रुता, शत्रु से बड़ा वादविवाद होता है॥९॥ दिनानि समरूपाणि लाभोऽप्यल्पो भवेदिह । स्वल्पा च सुखसम्पत्तिर्विदशासु रवेर्भृगुः ॥१०॥(सू.शु.) सूर्य के अंतर में शुक्र के प्रत्यन्तर में समान रूप से दिन बीतते हैं, लाभ थोड़ा होता है और थोड़ी ही सुख सम्पत्ति होती है॥१०॥ इति सूर्यान्तरे प्रत्यंतर फलम्। अथ चन्द्रान्तरे चन्द्रादीनां प्रत्यन्तरफलम् - भूभोज्यधश्रसम्प्राप्ती राजपूजामहत्सुखम् । महालाभः दारसौख्यं विदशासु स्वयं शशी ॥११॥(चं.चं.) चन्द्रमा के अन्तर में चन्द्रमा के ही प्रत्यन्तर में भूमि, भोजन पदार्थ, धन की प्राप्ति, राजा से पूजा, बड़ा सुख, अत्यन्त लाभ और स्त्री का सुख होता है॥११॥ मतिर्वृद्धिर्महापूज्यः सुखं बंधुजनैः सह । धनागमं शत्रुभयं चन्द्रस्यान्तर्गतः कुजः ॥१२॥(चं.मं.) चन्द्रमा के अन्तर में भौम के प्रत्यन्तर में बुद्धि में वृद्धि, अत्यंत आदर, बंधुओं से सुख, धन का आगम और शत्रु का भय होता है॥१२॥ भवेत्कल्याणसम्पत्ती राजवित्तसमागमः । अशुभैरल्पमृत्युश्च चन्द्रेचन्द्रान्तरे तमः ॥१३॥(चं.श.) चन्द्रमा के अन्तर में राहु के प्रत्यन्तर में कल्याण, सम्पत्ति, राजा से धन का समागम, अशुभ और अल्पमृत्यु का भय होता है॥१३॥ वस्त्रलाभो महातेजो ब्रह्मज्ञानं च सद्गुरोः । राज्यालङ्करणावाप्तिश्चन्द्रचन्द्रान्तरे गुरुः ॥१४॥(चं.वृ.) चन्द्रमा के अन्तर में गुरु के प्रत्यंतर में वस्त्र का लाभ, तेज में वृद्धि, अच्छे गुरु से ब्रह्मज्ञान की राज्यचिह्नों की प्राप्ति होती है॥१४॥ दुर्दिने लभते पीडा वातपित्ताद्विशेषतः । धनधान्ययशोहानिश्चन्द्रचन्द्रान्तरे शनिः ॥१५॥(चं.श.) चन्द्रमा के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में दुर्दिन में विशेषकर वायु पित्त विकार से कष्ट धन धान्य और यश की हानि होती है॥१५॥