भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

५७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। अग्निरोगो महत्पीडा मुखनेत्रशिरोव्यथा। संचितार्थात्मनः पीडा भृगोः सूक्ष्मगतेध्वजे ॥८२॥ (शु.के.) शुक्र के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में जठराग्नि का रोग, महापीड़ा, मुख, नेत्र और शिर में पीड़ा और संचित-धन से आत्मा को कष्ट होता है॥८२॥ इति भृगोः सूक्ष्मान्तरदशा फलम्। इति बृहत्पाराशर होरायाः पूर्वार्धे सूर्यादि सूक्ष्मान्तर्दशा फलं समाप्तम्। अथ प्राणदशा फलाध्यायः। तत्रादौ प्राणदशानयन प्रकारः- स्वसूक्ष्मदशायाश्चपिंडे विघटिकात्मके । स्वाब्दैर्हते पुनर्भाक्ते विंशोत्तरशतेन च । लब्धं विघटिकाज्ञेया विपलानिततः परम् ॥१॥ ग्रह के सूक्ष्मदशामान की पला बनाकर उसे ग्रह के दश वर्ष (जिस ग्रह की प्राणदशा लानी हो उस ग्रह के दशा वर्ष से) गुणाकर गुणन फल में १२० का भाग देने विघटिकात्मक उस ग्रह की प्राणदशा होती है॥१॥ उदाहरण- जैसे सूर्य की दशा में सूर्य के अंतर में सूर्य ही के प्रत्यन्तर में सूर्य का सूक्ष्मांतर १६ घटी १२ पल है इसका पला बनाया तो १६×६०+१२ = ९७२ पल हुआ इसे सूर्य की दशा वर्ष ६ से गुणाकिया ५८३२ हुआ इसमें १२० का भाग देने से लब्धि ३६ विपल प्राप्त हुआ। अर्थात् सूर्य की दशा और उन्हीं के अंतर-प्रत्यंतर और सूक्ष्मांतर में सूर्य की प्राण दशा ० घटी = ४८ पल और ३६ विपल होगी। इसी प्रकार सूक्ष्म के पलात्मक पिंड को चन्द्रमा के दशावर्ष १० से गुणाकर ९७२० में १२० का भाग देने से लब्धि ८१ पल याने १ घटी २१ पल ० विपल यह सूर्य के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा हुई। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के दशा वर्ष से गुणकर भाग देने से उन लोगों की प्राणदशा हो जाती है।