बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्य के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में बंधन, प्राण का भय, चित्त में उद्वेग, अनेक बाधा और हानि होती हैं।।७।। राजान्नभोगः सततं राजलांछनतत्पदम् । आत्मासन्तर्पयेदेवं रवेः प्राणगतेबुधे ।।८।। (सू.बु.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में निरन्तर राजभोग राजकीय चिन्हों से युक्त और आत्मा को शान्ति मिलती है।।८।। अन्योन्यं कलहश्चैव वसुहानिः पराजयः । गुरुस्त्रीबंधुहानिश्च सूर्यप्राणगते ध्वजे ।।९।। (सू.के.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में परस्पर कलह धन की हानि और पराजय गुरु, स्त्री, बंधु की हानि होती है।।९।। राजपूजा धनाधिक्यं स्त्रीपुत्रादिभवं सुखम् । अन्नपानादिभोगश्च रवेः प्राणगते भृगौ ।।१०।। (सू.शु.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राण दशा में राजा से पूजा, धनका विशेष लाभ, स्त्री पुत्रादि का सुख और अन्न पानादि का सुख होता है।।१०।। इति सूर्य प्राणदशाफलम्। अथ चन्द्रप्राणदशाफलम्। योगाभ्यासं समाधिं च स्त्रीपुत्रादिसुखं तथा । इति सर्व समासेन चन्द्रप्राणे भवन्ति च ।।११।। (चं.चं.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा में योगाभ्यास, समाधि, स्त्री पुत्रादि का सुख यह सब एक साथ ही होता है।।११।। क्षयं कुष्ठं बंधुनाशं रक्तस्त्रावान्महद्भयम् । भूतावेशादि जायेत चन्द्रप्राणगते कुजे ।।१२।। (चं.मं.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में भौम की प्राणदशा में क्षय रोग, कुष्ठ रोग की संभावना, बंधु का नाश, रक्तस्राव से कष्ट और भूत आदि का आवेश होता है।।१२।। सर्पभीतिविशेषेण भूतोपद्रववान्सदा । दृष्टिक्षोभोमतिभ्रंशश्चन्द्रप्राणगतेप्यहौ ।।१३।। (चं.रा.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में विशेषकर सर्प का भय, भूत का उपद्रव, दृष्टि में विकार और बुद्धि नाश होता है।।१३।।