भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 589

सुदर्शनचक्रम्। ५८९ चक्र परिचय- यह चक्र वृत्ताकार जन्मपत्र में ग्रहों की स्थिति प्रगट करने को खींचा गया है। बाहरी वृत्त में जन्म लग्न से प्रारम्भ कर ग्रह लिखे गये हैं। दूसरे में चन्द्रमा से ग्रहों की स्थिति लिखी गई है तथा तीसरे वृत्त में सूर्य से ग्रहों की स्थिति लिखी गई है। इस प्रकार से यह चक्र एक ही में तीनों स्थितियों की तुलना को दिखलाता है। भाव विचार करने के नियम- किसी भाव का विचार करते समय उस भाव को प्रगट करने वाली तीनों राशियों का विचार करना चाहिये, जैसे दूसरे स्थान का विचार करते समय लग्न से चन्द्र से और सूर्य से दूसरे स्थान से स्थित ग्रहों का विचार करना चाहिये। १।४।७।१०।८ भाव में राहु या पापग्रह हो तो कष्टकारक होते हैं। शुभ ग्रह हों तो शुभ होता है। १२ वें भाव को छोड़कर अन्य भावों में शुभग्रह और ३।६।११ भावों में पापग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। विशेषरूप से राहु जहाँ रहता है वह अशुभ फल देता है। यदि किसी भाव में शुभग्रह है तो उस भाव का फल शुभ होगा और पूर्ण प्रभावशाली होगा। शुभग्रह शुभ फल ही देते हैं। जहाँ भी पापग्रह हो यदि उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो शुभफल कहना चाहिये। सप्तवर्ग में अधिक अशुभ वर्गोंवाले शुभग्रह के अपने शुभकारी गुण नष्ट हो जाते हैं। अनेक शुभग्रहों के वर्गों से युक्त होने पर पापग्रह भी अपेक्षया शुभद हो जाता है। यदि कोई स्थान या भाव रिक्त हो तो उसका प्रभाव उस भाव के देखनेवाले ग्रहों से निकालना चाहिये। यदि कोई न देखता हो तो उसके स्वामी को देखना चाहिये। उदाहरण-जैसे सुदर्शन चक्र में १०वाँ स्थान रिक्त है तथा अपने स्वामी से देखा जाता है जो चन्द्रमा के साथ बैठा है। अतः यहाँ यह कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति अपने पेशे में पूर्णरूप से सफल होगा। विशेष-सूर्य प्रथम भाव में शुभफल देनेवाला माना जाता है अन्य स्थानों में अशुभ माना जाता है। पापग्रह अपनी राशि में अशुभ नहीं होते हैं।