बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२९ षड्बलैक्ये शुभाशुभादिकम् - • नवाग्नयः सुराः खाग्निर्दशसंगुणिताः क्रमात् । रव्यादयः सुबलिनो राशीनां स्वामिनोवशात् ।।३८।। अधिकं पूर्णमेवं स्याद्बलं चेद्बलिनो मताः । सूर्यादि ग्रहों के षड्बलैक्य ३९, ३६, ३०, ४२, ३९, ३३, ३० इनको १० से गुणा देने से क्रम से ३९०, ३६०, ४२०, ३९०, ३३०, ३०० इतना हो तो सूर्यादि सुबली इससे अधिक हो तो पूर्णबली होता हैं।।३८।। स्थानादि बले पृथक् पृथक् सुबलित्वम् - गुरुसौम्यरवीणां तु भूतषट्केंदवो द्विज ।।३९।। गुरु, बुध, सूर्य के स्थानबल, दिग्बल, चेष्टाबल, कालबल और अयन बल में क्रम से १६५।।३९।। पंचाग्नयः रवभूतानि करभूमिसुधाकराः । खाग्नयश्च क्रमात्स्थानदिक् चेष्टासमयायने ।।४०।। ३५, ५०, ११२, ३० इतने बल हो तो सुबली।।४०।। सितेन्द्वोर्व्यग्निचंद्राश्च खेषवः खाग्नयःशतम्। चत्वारिंशत् क्रमाद्भौममन्दयोः पण्णवक्रमात् ।।४१।। त्रिंशतूखवेदाः सप्तांगा नखाश्च बलिनोविदुः । और शुक्र, चन्द्र, के १३३, ५०, ३०, १००, ४० हो तो सुबली, भौम और शनि के ९६।।४१।। ३०, ४०, ६७, २० हों तो सुबली होते हैं।। भावफलदाताग्रह- भावस्थानग्रहैः प्रोक्तयोगे ये योगहेतवः । तेषां बली यः कर्त्तासौ स एव फलप्रदः ।।४२।। योगेष्वाप्तेषु बहुषु न्याय एवं प्रकीर्त्तितः । अनेक प्रकार के योग कहे गये हैं उनमें जिन-जिन ग्रहों से शुभ अशुभ योग होते हैं उनमें जो बलवान् हो और जिसका बल अधिक हो वही फल देता है।।४२।। और वही योग का कर्त्ता या कारण होता है। इसी प्रकार अनेक योग एक ही भाव के हों तो इसी प्रकार से किसी एक से फल को कहना चाहिये।