बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथैतच्छास्त्राधिकारिलक्षणम् - गणितेषु प्रवीणश्च शब्दशास्त्रे कृतश्रमः । न्यायविद्बुद्धिमान् होरास्कंधश्रवणसम्मतः ॥४३॥ जो गणित शास्त्र में कुशल हो, व्याकरण में निपुण हो, न्यायशास्त्र को जानने वाला हो, बुद्धिमान् ।।४३।। दैवविद्देशिको देवसंमतो देशकालवित् । ऊहापोहपटुः प्राज्ञः पटुः स्वजनसंमतः ॥४४॥ साहित्य शास्त्र में कुशल हो, नित्य देवाराधन करने वाला हो, देश-काल को जानने वाला हो, तर्क और समाधान करने में समर्थ हो और स्वजनों के अनुकूल रहने वाल चतुर हो वह इस शास्त्र को पढ़ने और फल कहने का अधिकारी होता है।।४४।। इति पाराशरहोरायामुत्तरभागेभावफलाद्यानयनेद्वितीयोऽध्यायः । अथैष्टकष्टाध्यायः । उच्चरश्मिसाधनम् - नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिके चक्राद्विशोधयेत् । उच्चरश्मिर्भवेद्राशिः सैको द्विघ्नांशसंयुतः ॥१॥ ग्रह में उसके नीच को घटा देना शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२ राशि में घटाकर राशि में १ जोड़ देना और अंशादि को दूना कर राशि में जोड़ देना तो उच्चरश्मि होगी।।१।। जैसे- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें सूर्य का नीच ६।१० घटाने से शेष ९।८।२६।३४ शेष रहा यह ६ राशि से अधिक है इसलिये इसे १२ राशि में घटाने से शेष २।२१।३३।२६ शेष बचा यहाँ राशि में १ जोड़ने से ३ अंशादि को दूना कर इसमें जोड़ने से ३।४३।६।५२ यह सूर्य की उच्चराशि हुई इसी प्रकार सभी ग्रहों की उच्चरश्मि साधन करना चाहिये। उच्चरश्मिचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | ५ | ६ | ५ | ५ | ४ | ६ |
| ४३ | २० | ३० | ४० | ४४ | ४९ | ३४ |
| ६ | ५८ | ४७ | ४५ | १८ | ५३ | ३८ |