भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथैष्टकष्टाध्यायः। ६३१ चेष्टारश्मिसाधनम् – सायनार्कः सत्रिभो इन्दुश्च भानुवर्जितः । चेष्टाकेन्द्रं कुजादीनां पूर्वाध्याये समीरितम् ।।२।। सूर्य में अयनांश जोड़कर उसमें ३ राशि जोड़ने से सूर्य का चेष्टाकेन्द्र और चन्द्रमा में सूर्य को घटाने से चन्द्रमा का चेष्टाकेन्द्र होता है। और भौमादि का चेष्टाकेन्द्र पूर्वाध्याय में कहा ही हुआ है।।२।। शुभाशुभरश्मिसाधनम् – उच्चरश्मिभवदानीय चेष्टारश्मिं द्वयोर्युतेः । दलं तु शुभरश्मिः स्यादष्टभ्यो वर्जितोऽशुभः ।।३।। चेष्टाकेन्द्र पर से उच्चरश्मि साधन के तरह चेष्टारश्मि का साधन कर दोनों (उच्चरश्मि और चेष्टारश्मि) का योग कर आधा करने से जो आवे वह शुभरश्मि होती है और इसे ८ में घटाने से अशुभरश्मि होती है।।३।। जैसे- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें अयनांश २१।५१।१८ जोड़ने से ४।१०।१७।५२ सायन सूर्य हुआ इसमें ३ राशि जोड़ने से ७।१०।१७।५२ यह सूर्य का चेष्टाकेन्द्र हुआ इस पर पूर्वोक्त रीति से ५।३९।२४ सूर्य की रश्मि हुई।।३।। चेष्टारश्मिचक्र। | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | | | ५ | १ | ३ | २ | १ | ४ | ४ | चेष्टाकेन्द्र | | ३९ | ३१ | ५१ | ४ | ४८ | ४२ | २८ | | | २४ | ५० | ४२ | ३० | ४२ | ५६ | ४ | | | ४ | ३ | ५ | ३ | ३ | ४ | ५ | शुभ रश्मि | | ४१ | २६ | ११ | ५२ | ४६ | ४६ | ३१ | | | ३० | २४ | १४ | ३७ | ३० | २२ | २१ | | | ३ | ४ | २ | ४ | ४ | ३ | २ | अशुभ रश्मि | | १८ | १३ | ४८ | ७ | १३ | २३ | २८ | | | ३० | ३६ | ४६ | २३ | ३० | ३८ | ३९ | | इष्टकष्टसाधनम् – उच्चचेष्टाकरौ व्येकौ दिग्भिर्हत्वा तु योजयेत् । दलयेदिष्टमन्यत्स्यात्षष्टिभ्यो वर्जितं फलम् ।।४।। ग्रहों के उच्चरश्मि और चेष्टारश्मि में एक एक घटाकर १० से गुणा कर दोनों का योग कर आधा करने से इष्ट होता है इसे ६० में घटाने से कष्ट होता है।।४।।