भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 800 में से

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पृष्ठ 635

अथैकषष्ठाध्यायः। ६३३ दिग्बलादौ शुभाशुभत्वम् - दिग्बलं दिक्फलं तस्य तथा दिनफलं भवेत् । तयोः फलं शुभं प्रोक्तं षष्ट्या वर्ज्यं तथेतरम् ।।१९।। जो ग्रहों का दिग्बल है वह दिक्फल हैं और जो दिनबल है वह दिन फल हैं, दोनों फलों का योग करने से शुभ फल और इसे ६० में घटाने से शेष अशुभ फल होता है।।१९।। शुभाधिके शुभं नेष्टमशुभे चाधिके शुभात् । बलैरेव हते स्यातां दृष्टिं हन्यात्स्फुटैव सा ।।२०।। यदि शुभफल पापफल से अधिक है तो उस ग्रह का फल शुभ, अशुभ फल अधिक हो तो अशुभ फल होता है। पूर्वोक्त इष्टबल, कष्टबल (श्लोक ५ में) उससे दृष्टि को गुणा कर देने से इष्टदृष्टि और कष्टदृष्टि होती है।।२०।। पूर्वोक्तशुभाशुभबलस्यस्पष्टीकरणम् - बलैः षड्भिः समेधित्वा समानीतैः पृथक्-पृथक्। बलिनश्चोक्तसंज्ञैश्च बलैरेव हरेत्ततः ।।२१।। ग्रह षड्बलों (होरा आदि षड्बल) को ६ स्थान में रखकर इष्टबल से तथा कष्टबल से अलग अलग गुणकर पृथक् पृथक् षड्बलों से भाग देकर सभी फलों का योग करने से इष्ट स्थान स्पष्ट शुभ और कष्ट स्थान में स्पष्ट अशुभ फल होता है।।२१।। तत्तद्वलफलानि स्युरशुभानि शुभानि च । शुभपापफलाभ्यां च दृष्टिं हन्याद्वलं तथा ।।२२।। इसी प्रकार से दृष्टि के इष्ट कष्ट से दृष्टिबल को गुणाकर भाग देने से दृष्टि का शुभाशुभ फल होता है।।२२।। सग्रहे भावफले विशेषः- दृष्टेश्च शुभ पापोत्थे बले स्यातां तथैव च । भावानां च फले प्रोक्ते पतीनां च फले उभे ।।२३।। तन्वादि भावों के भी दो फल (भाव का तथा उसके स्वामी का) होता है दोनों के योग के तुल्य भाव का शुभाशुभ फल होता है।।२३।। सराशिर्गृहयुक्तश्चेद्वसाधनसंगुणे । फले तस्य शुभे युंज्यादशुभे वर्जयेच्छुभे ।।२४।।

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