बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 636, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें६३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि भावस्थ राशिग्रह युक्त हो तो भाव साधन से गुणा कर दे और शुभग्रह भाव में हो तो उस भाव के शुभ फल को फल में जोड़ दे और अशुभ भावफल में घटा दे और भाव में ।। १४ ।। पापांश्रेदन्यथा चैवं बले दृष्ट्यां च तेऽत्रतु । युंज्यादुच्चादिषु फलममित्रादिषु वर्जयेत् ।। १५ ।। पापग्रह हो तो इससे विपरीत करने से भाव का इष्ट (शुभ) और कष्ट (अनिष्ट) स्पष्ट होता है। इसी प्रकार दृष्टि में भी करना चाहिये किन्तु यह फल यदि उच्चादि का हो तो योग और शत्रु आदि का हो तो घटाना चाहिये ।। १५ ।। अष्टकवर्गे विशेषः- स्थाने चैवं क्रमात्प्रोक्तं करणेचान्यथाक्रमः । राशिद्वयगते भावे तद्राश्यधिपतेः क्रिया ।। १६ ।। इसी प्रकार से स्थान (रेखा) में भी (अष्टकवर्ग में) क्रिया करनी चाहिये किन्तु करण (बिन्दु) में विपरीत क्रिया होती है, एक ही भाव में २ राशि हो तो उनके स्वामी के साथ क्रिया करनी चाहिये ।। १६ ।। स्थानाधिकस्तु भावेन लाभभावः प्रकीर्त्तितः । तत्समाने च तद्भावे तदानीं स्थानदान् ग्रहान् ।। १७ ।। संयोज्य स्थानसंख्यायां दलमेतत्समं भवेत् ।। १८ ।। भाव से रेखा अधिक हो तो उस भाव का फल या भाव लाभदायक होता है। यदि दोनों भावों में अधिक रेखा हो तो दोनों का योग कर आधा करने से जो आवे उसके समान ही भावफल होता है ।। १७, १८ ।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे इष्टकष्टाध्यायस्तृतीयः । ३ अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । विधात्रालिखिता या साललाटाक्षरमालिका । तस्याः शरीरकथनं वक्ष्यामि च पृथक्-पृथक् ।। १ ।। विधाता (ब्रह्मा) ने ललाट में जो अक्षरों की पंक्ति लिखी है उसको मैं शरीर के रूप में पृथक् पृथक् कह रहा हूँ ।। १ ।।