भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 637

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३५ लग्नाच्छरीरचिन्ता च द्वितीयात्स्वं च पैतृकम् । भरणीयं कुटुंबं च पश्वादिं च वदेद्बुधः ॥२॥ लग्न (तनु भाव) से शरीर की चिन्ता का, विचार करना चाहिये और द्वितीय भाव से अपने उपार्जित धन और पैतृक संपत्ति, पालनीय कुटुंब का तथा पशु आदि का विचार करना चाहिये ॥२॥ तृतीयात्सोदरं बुद्धिं दुःपूर्वा विक्रमं विदुः । चतुर्थात्पितरं वेश्म सुखं लालित्यमेव च ॥३॥ तीसरे भाव से भाइयों का, दुष्ट बुद्धि का और पराक्रम का विचार करना चाहिये, चौथे भाव से गृह का, सुख का, सौहार्द का विचार करना चाहिये ॥३॥ सौमनस्यमपत्यानि प्रज्ञां मेधां च पंचमात् । हानिं व्याधिमरिं षष्ठान्मैथुनं स्त्रीं जयं ततः ॥४॥ पांचवें भाव से सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) का, संतान का, सुबुद्धि का और धारणा शक्ति का विचार करना चाहिये । छठें भाव से हानि, व्याधि (रोग) और शत्रु का विचार तथा सप्तम भाव से मैथुन, स्त्री और युद्ध में विजय का विचार करना चाहिये ॥४॥ मृतिं पराजयं दुःखं हानिं व्याधिं तथाष्टमात् । सौशील्यभाग्यधर्मांश्च नवमाद्दशमात्तथा ॥५॥ मानास्पदाज्ञाकर्माणि आयादर्थं व्ययाद्व्ययम् । आठवें भाव से मृत्यु का, पराजय का, दुःख (व्यसन) का, हानि का, व्याधि का विचार करना चाहिये। नवम भाव से सुशीलता, भाग्य, वैभव और धर्म का विचार करना चाहिये । दशम भाव से सत्कार, स्थान, आज्ञा और शुभाशुभ कर्म का विचार करना चाहिये ॥५॥ ग्यारहें भाव से द्रव्य के प्राप्ति का और बारहें भाव से व्यय का विचार करना चाहिये । उच्चस्थानस्थ रश्मि ध्रुवांकः- दिग्भवेष्विषुसंप्ताष्टशराः स्वोच्चे करा रवेः ॥६॥ यदि सूर्यादि ग्रह अपने उच्च राशि में हो तो क्रम से १०, ११, ५, ५, ७, ८, ५ यह रश्मि ध्रुवांक होता है ॥६॥ नीचेन चांतरा प्रोक्ता रश्मयस्त्वनुपातजाः । नीचोनं तु ग्रह- म्नाधिके चक्राद्विशोधयेत् ॥७॥