भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३५ लग्नाच्छरीरचिन्ता च द्वितीयात्स्वं च पैतृकम् । भरणीयं कुटुंबं च पश्वादिं च वदेद्बुधः ॥२॥ लग्न (तनु भाव) से शरीर की चिन्ता का, विचार करना चाहिये और द्वितीय भाव से अपने उपार्जित धन और पैतृक संपत्ति, पालनीय कुटुंब का तथा पशु आदि का विचार करना चाहिये ॥२॥ तृतीयात्सोदरं बुद्धिं दुःपूर्वा विक्रमं विदुः । चतुर्थात्पितरं वेश्म सुखं लालित्यमेव च ॥३॥ तीसरे भाव से भाइयों का, दुष्ट बुद्धि का और पराक्रम का विचार करना चाहिये, चौथे भाव से गृह का, सुख का, सौहार्द का विचार करना चाहिये ॥३॥ सौमनस्यमपत्यानि प्रज्ञां मेधां च पंचमात् । हानिं व्याधिमरिं षष्ठान्मैथुनं स्त्रीं जयं ततः ॥४॥ पांचवें भाव से सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) का, संतान का, सुबुद्धि का और धारणा शक्ति का विचार करना चाहिये । छठें भाव से हानि, व्याधि (रोग) और शत्रु का विचार तथा सप्तम भाव से मैथुन, स्त्री और युद्ध में विजय का विचार करना चाहिये ॥४॥ मृतिं पराजयं दुःखं हानिं व्याधिं तथाष्टमात् । सौशील्यभाग्यधर्मांश्च नवमाद्दशमात्तथा ॥५॥ मानास्पदाज्ञाकर्माणि आयादर्थं व्ययाद्व्ययम् । आठवें भाव से मृत्यु का, पराजय का, दुःख (व्यसन) का, हानि का, व्याधि का विचार करना चाहिये। नवम भाव से सुशीलता, भाग्य, वैभव और धर्म का विचार करना चाहिये । दशम भाव से सत्कार, स्थान, आज्ञा और शुभाशुभ कर्म का विचार करना चाहिये ॥५॥ ग्यारहें भाव से द्रव्य के प्राप्ति का और बारहें भाव से व्यय का विचार करना चाहिये । उच्चस्थानस्थ रश्मि ध्रुवांकः- दिग्भवेष्विषुसंप्ताष्टशराः स्वोच्चे करा रवेः ॥६॥ यदि सूर्यादि ग्रह अपने उच्च राशि में हो तो क्रम से १०, ११, ५, ५, ७, ८, ५ यह रश्मि ध्रुवांक होता है ॥६॥ नीचेन चांतरा प्रोक्ता रश्मयस्त्वनुपातजाः । नीचोनं तु ग्रह- म्नाधिके चक्राद्विशोधयेत् ॥७॥

६३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । नीच राशि का ध्रुवांक नहीं है, उच्च नीच के मध्य में अनुपात द्वारा रश्मि का साधन करना चाहिये वह इस प्रकार से— नीच को ग्रह में घटा दे यदि शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२ राशि में घटाकर।।७।। स्वीयरश्मिहतं षड्भिर्भजेत्स्यूरश्मयःस्वकाः । उच्चस्वर्क्षसुहृत्स्वभागैऽगाब्धि द्विसंगुणाः ।।८।। नीचारिद्वादशांशे तु नृपांशोनाः कराश्च ते । शेष को ग्रह के उच्च रश्मि ध्रुवांक से गुणकर उसमें ६ से भाग देने से लब्ध रश्मि होती हैं। ग्रह उच्च, स्वराशि मित्र की राशि के द्वादशांश में हो तो क्रम से ६, ४, २ से गुण देने से।।८।। और नीच शत्रु के द्वादशांश में हो तो षोडशांश कम कर देने से स्पष्ट रश्मि होती है। जैसे सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें सूर्य के नीच ६।१० को घटाने से ८।२२।२६।३४ हुआ यह ६ राशि से अधिक है अतः इसे १२ राशि में घटाने से शेष ३।७।३३।२६ हुआ इसे ध्रुवांध १० से गुणा करने से ३१।५।३४।२० हुआ इसमें ६ से भाग देने से लब्धि ५।५।५५।५२ यह सूर्य की रश्मि हुई। सूर्य शनि के द्वादशांश में है और सूर्य का शनि अधिशत्रु है अतः पूर्वोक्त रश्मि का षोडशांश ०।१९।४४।४४ रश्मि में घटाने से शेष ४।२५।४८।५२ यह सूर्य की स्पष्ट रश्मि हुई इसी प्रकार से शेष ग्रहों की रश्मि का साधन करना चाहिये। रश्मि चक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
१५१११०
२५४८३२
४८२६५३४८२६३५१.२
विशेष संस्कारः—
मूलत्रिकोणस्वर्क्षाधिमित्रमित्रनवांशके ।।९।।
यदि ग्रह अपने मूलत्रिकोण, अपनी राशि, अधिमित्र की राशि, मित्र की राशि
में नवांश की राशि।।९।।
द्रेष्काणेऽपि च होरायां त्रिंशांशे च क्रमात्तथा ।
अष्टघ्ना द्व्यब्धिषट्सप्तभक्ता युक्तास्तुरश्मयः ।।१०।।
अरावध्यरिनीचे च वेदद्व्यखिलहीनकाः ।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३७ द्रेष्काण की राशि, होरा और त्रिंशांश की राशि जिसमें हो उसे देखकर ध्रुवोत्पन्न रश्मि (८-९ श्लोकोक्त) को ८ से गुण कर क्रम से मूलत्रिकोण में २ से, अपनी राशि में ४ से, अधिमित्र में ६ से और मित्र में ७ से भाग देकर लब्धि के पूर्वोक्त रश्मि में जोड़ने से उच्च रश्मि होती है।।१०।। पूर्वोक्त वर्गों में यदि शत्रु राशि हो तो चार से भाग देकर लब्धि को घटाने से अधि शत्रु राशि हो तो २ से भाग देकर और नीच राशि में हो तो संपूर्ण को घटाने से उच्च रश्मि होती है। अन्य संस्कारः- उच्चे च त्रिगुणं प्रोक्तं स्वत्रिकोणे द्विसंगुणम् ।।११।। यदि रश्मि का स्वामी अपने उच्च राशि में हो तो उच्च रश्मि को त्रिगुणित, अपने मूल त्रिकोण राशि में हो तो द्विगुणित।।११।। स्वर्क्षे त्रिघ्ना द्विसंभक्तास्त्वधिमित्रगृहेऽपि च । वेदघ्ना रामसंभक्ता मित्रमे षड्गुणास्ततः ।।१२।। स्वराशि में होते त्रिगुणित कर दो से भाग देना और अधिमित्र की राशि में हो तो पूर्व रश्मि को चार से गुणाकर तीन से भाग देकर लब्धि को पूर्व रश्मि में जोड़ने से, मित्र के राशि में ६ से गुणा कर ५ का भाग कर लब्ध को रश्मि में जोड़ने से।।१२।। पंचभक्तास्त्वथ शत्रुगृहे द्विघ्नाश्चतुर्हताः । अधिशत्रोः करघ्नाश्च पंचभक्ता न नीचभे ।।१३।। शत्रु के गृह में हो तो २ से गुणा कर ४ से भाग देकर लब्ध को जोड़ने से स्पष्ट रश्मि होता है। और अधि शत्रु की राशि में हो तो दूना कर पाँच से भाग देकर लब्धि को जोड़ने से स्पष्ट रश्मि होती है। नीच राशि में हो तो कोई संस्कार नहीं करना।।१३।। मतांतरात् रश्मि हानिवृद्धिः- शनिं सितं बिना ताराग्रहा अस्तंगता यदि । विरश्मयो भवन्त्येवं वक्रादौ द्विगुणास्ततः ।।१४।। शनि शुक्र को छोड़कर शेष ग्रह (भौम, बुध, गुरु) अस्त हों तो रश्मि का अभाव होता है, रश्मिपति वक्रारंभ में हों तो पूर्व रश्मि को दूना करने से।।१४।।

६३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अनुपातोंऽन्तरे वक्रं त्यागेऽष्टांशविहीनकाः । मंदायां दशभागोना वस्वंशोना कराःस्मृताः ।। १५ ।। वक्र के अन्त्य में हो तो रश्मि में ८ से भाग देने से लब्ध स्पष्ट रश्मि होती है, वक्र के मध्य में हो तो अनुपात द्वारा रश्मि लाना चाहिये। रश्मिपति मंदगति हो तो रश्मि का दशांश पूर्व रश्मि में घटाने से, यदि मंदतर गति हो तो अष्टमांश हीन करने से ।।१५।। तथा शीघ्रतरायां च वेदांशोनाः कराः स्मृताः । अंगाशोनाश्च शीघ्रायां केचिदेवं वदन्ति हि ।। १६ ।। शीघ्रगति हो तो छठाँ भाग हीन करने से और शीघ्रतर गति हो तो चतुर्थांश हीन करने से स्पष्ट रश्मि होती है ऐसा कुछ ऋषियों का मत है।।१६।। अथ ग्रहाणां अष्टधा गतिः- वक्रानुवक्रा विकला शीघ्रा शीघ्रतरागतिः । वृद्धिहीने तु शिष्टे द्वे वर्जनीये समासमा ।। १७ ।। वक्र, अनुवक्र, विकला, शीघ्रगति, शीघ्रतरा, मंदगति, मंदतरा, समासमा ये आठ प्रकार की ग्रहों की गति होती हैं। शीघ्रतर गति वृद्धि हीन होने से मंदगति और शीघ्रगति वृद्धिहीन होने से अतिमंदतर होती है।।१७।। योगविशेषात्ह्रासवृद्धिः । योगेषु ये ग्रहाः प्रोक्तास्तेषां योगे च रश्मयः । पापसौम्यरिमित्राणां योगे हानिश्च कीर्त्तिताः ।। १८ ।। उच्चादिषु पूर्वोक्ताः पापो बलवशाद्भवेत् ।। १९ ।। पूर्व में जो राजयोग कहे गये हैं उनमें (राजयोग कारक और दरिद्र योग कारक) राजयोग कारक ग्रहों के रश्मियों के योग में दरिद्र योग कारक ग्रहों के रश्मियों को घटा देने से शेष राजयोग कारक रश्मि होती है।। १८ ।। इसी प्रकार पापग्रहों की उच्चादि नव स्थान पर्यन्त रश्मियों को उनके बल के अनुसार न्यूनाधिक करने से उनकी स्पष्ट रश्मि होती है।।१९।।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३९ द्विग्रहादियोगे निर्णयः- द्विग्रहादिषु योगेषु ग्रहभावकलाहताः । ग्रह गति संज्ञानुरूपेण फलानां निर्णयः स्मृताः ।।२०।। दो तीन आदि ग्रहों के योग में ग्रहों के भाव के फलादि को उनके रश्मियों से गुण देना यदि साठ ६० से अधिक हो तो ६० से भाग देने से लब्धि स्पष्ट रश्मि होती है। ग्रहों के रश्मियों का फल उनके गति के अनुसार ही होता है।।२०।। इष्टकष्टरश्मेः प्रयोजनम् – इष्टकष्टबलसंगुणास्ततस्तत्करानथ च संयुतास्तुतान्। निश्चितार्थमखिलं समीक्ष्यतत्रस्तुतं तु सकलं वदेद्बुधः।।२१।। ग्रहों के इष्ट कष्ट बल से उनके रश्मियों को गुणकर उसमें ६० से भाग देने से ग्रहों की इष्ट और कष्ट रश्मि होती है। इन सम्पूर्ण रश्मियों को देखकर ग्रहों के फलों को कहना चाहिये।।२१।। एकतः पंचरश्मियोग फलम् – एकादि पंचकं यावद्दरिद्रा भृशदुःखिताः । नीचानां दासतां याता अपि जाता कुलोत्तमे ।।२२।। एक से पांच रश्मि योग में उत्पन्न पुरुष अत्यंत दुःखी होता है। यदि उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुष हो तो नीचों की नौकरी करता है।।२२।। दशरश्मियोग फलन् – परतो दशकं यावत्केवलं जठराय वै । निःस्वाः कदाचिद्दासाश्च भारवाहाः कदाचन । स्त्रीपुत्रगृहहीनाश्च वंशायोग्यक्रियारताः ।।२३।। ६ से १० तक रश्मियोग हो तो पुरुष केवल पेट भरनेवाला, निर्धन, कभी दासता करनेवाला, कभी बोझा ढोने का काम करनेवाला, स्त्री पुत्र से हीन और कुल के विपरीत कार्य करनेवाला होता है।।२३।। एकादशतो त्रयोदशपर्यन्तं रश्मिफलम् – एकादशेऽल्पपुत्रस्यादल्पस्वं स्त्रीविमानितः । विभ्रति कृच्छ्रेण निजं स्वल्पं च कुटुम्बकम् ।।२४।। ग्यारह रश्मियोग हो तो अल्पपुत्र, अल्पधन और स्त्री से अनादर और थोड़े कुटुम्ब को भी कष्ट से पालन करनेवाला होता है।।२४।।

६४० वृहतपाराशरहोराशास्त्रम् । द्वादशे निर्धनः मूर्खाधूर्ताः सत्त्वविनाशकाः । त्रयोदशे च चौराः स्युर्निर्धनाः कुलपांशवाः ॥२५॥ बारह रश्मियोग हो तो निर्धन, मूर्ख, सत्त्वहीन होता है, तेरह रश्मियोग में चोर निर्धन और कुलकलंक होता है॥२५॥ चतुर्दशतः पञ्चदश रश्मि फलम् - विद्वांश्चतुर्दशे धर्मेरतो मर्षी धनार्जकः । कुटुम्बभरणे सक्तः कुलयोग्यक्रियो भवेत् ॥२६॥ चौदह रश्मियोग हो तो धार्मिक, क्रोधहीन, धन को पैदा करनेवाला, कुटुम्ब के भरण पोषण में समर्थ और कुलयोग्य क्रिया करनेवाला होता है॥२६॥ रश्मिभिः पंचदशभिरेवं पूर्वोक्त गुणयुतोऽपिसन् । स्ववंशमुख्यो जनवानित्याह भगवान्मुनिः ॥२७॥ पंद्रह रश्मियोग में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुए भी अपने कुल में प्रधान और धनी होता है ऐसा पराशर मुनि ने कहा है॥२७॥ षोडशतः द्वाविंशतिपर्यन्त रश्मियोग फलम् - आविंशतेः कुलेशानां बहुभृत्यः कुटुम्बिनः । कीर्त्तिमंतश्च पूर्णाश्च स्वजनेन च षोडशात् ॥२८॥ १६ से २० तक रश्मियोग हो तो कुल को पालन करनेवाला, बहुत से नौकरों से युक्त, कुटुम्बी, कीर्त्ति से युक्त और स्वजनों से पूर्ण होता है॥२८॥ एकविंशति विख्यातः पंचाशज्जनपोषकः । दानशीलः कृपायुक्तो द्वाविंशे लोभ संयुतः ॥२९॥ २१ रश्मि हो तो बड़ा प्रसिद्ध और पचासों लोगों का पालन करनेवाला होता है और २२ रश्मियोग में दानशील और कृपालु होता है॥२९॥ त्रिंशत्पर्यन्तरश्मिफलम् - धनवानल्प शत्रुश्च प्रभुः स्वल्पगुणो भवेत् । त्रयोविंशे च मुख्यश्च विद्याहीनो धनीसुखी ॥३०॥ रश्मियोग २३ हो तो मनुष्य धनी, अल्प शत्रु, समर्थ और अल्पगुणी होता है॥३०॥

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६४१ आत्रिंशत्परतः श्रीमान्सर्वसत्वसमन्वितः । राजप्रियश्च चंडश्च जनैश्च बहुभिर्युतः ।।३१।। इसके बाद ३० रश्मि तक मनुष्य श्रीमान् सभी सत्वों से युक्त, राजप्रिय, प्रचंड और अनेक जनों से युक्त होता है।।३१।। एकत्रिंशत्शुस्त्रिंशत्यावद्रश्मिफलम् - एकत्रिंशे तु सचिवः द्वात्रिंशे वाहिनीपतिः । अत ऊर्ध्वं तु सामंत श्रातुःत्रिंशत्कपरावधिः ।।३२।। रश्मियोग ३१ हो तो राजमंत्री होता है, ३२ में सेनापति इसके बाद ३४ तक रश्मियोग में मांडलिक राजा होता है।।३२।। पंचत्रिशद्रश्मिफलम् - अत ऊर्ध्वं नृपे श्रांतः आपंचत्रिंशतः क्रमात् । शतपंचकमारम्य सहस्रावधिपोषकः ।।३३।। ३५ रश्मियोग हो तो मनुष्य राज्याधिकार के क्रम से परिश्रम करने से ५०० से १००० तक जनों का भरण पोषण करनेवाला होता है।।३३।। अत ऊर्ध्वं तु देशानां पोषकाः स्युः पंचविंशतिः । षडविंशतिश्च भानि स्युस्त्रिंशत् षड्त्रिंशदेव च ।।३४।। इसके बाद ३६ रश्मियोग में २५ ग्रामों का, ३७ रश्मियोग में २६ ग्रामों का, ३८ रश्मियोग में २७ ग्रामों का, ३९ रश्मियोग में ३० ग्रामों का और ४० रश्मियोग में ३६ ग्रामों का पालक होता है।।३४।। अत ऊर्ध्वं नृपाः क्षात्रधर्मिणः क्षत्रियोऽथवा । भूद्वित्र्यब्धीसुषट्सप्तभूभृज्जनपदाधिपाः ।।३५।। इसके बाद ४० रश्मियोग हो तो क्षत्रिय जातीय बालक राजा होता है। अन्य जातीय मनुष्य क्षत्रिय धर्म को पालन करता हुआ ४० से ४७ रश्मियोग में क्रम से १, २, ३, ४, ५, ६, ७ ग्रामों के राजाओं का शासक होता है।।३५।। पंचाशद्रश्मि संयोगे सम्राट् स्यादनुपातातः । अत ऊर्ध्वं तु देवेन्द्रतुल्यः स्युरिति पद्मभूः ।।३६।। इसके बाद ५० रश्मि योग में पुरुष सम्राट् होता है, इससे न्यून होने पर

६४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अनुपात द्वारा सम्राट् योग में न्यूनता समझना चाहिये। ५० से अधिक हो तो इन्द्र के समान होता है ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है।।३६।। रश्मौ विशेषफलम् - उच्चचेष्टोत्थयोगार्धगुणिताः षष्ठिभाजिताः । नरादीनां तु संख्याः स्युः स्पष्टा इत्याहपद्मभूः ।।३७।। उच्च रश्मि चेष्टा रश्मि का योग करके उसके आधे को पूर्व योग से गुण कर ६० से भाग देने से जो लब्धि हो उस संख्या के तुल्य मनुष्य घोड़ा, हाथी आदि सेवक होते हैं।।३७।। राजयोगेविशेषः- शूद्रादयः कलौ राजधर्मिणो म्लेक्षधर्मिणः । विप्राश्चेच्छ्रीधनैर्युक्ता यज्ञकर्मक्रियारताः ।।३८।। जो राजयोग कहे हैं वे कलियुग में शूद्रादि म्लेक्ष धर्मवालों को होता है। यदि यह राजयोग और उत्तम रश्मि योग ब्राह्मण को हो तो वह यज्ञादि कर्मनिष्ठ होता है और उसी पुण्य से स्वर्ग के राज्य को भोगनेवाला होता है।।३८।। विशेषः- योगरश्मिसमायोगे तदानीं तत्फलं विदुः । नाभासादिषु योगेषु राजयोगे स्थितं तु तत् ।।३९।। केवल राजयोग मात्र से ही राज्य की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु रश्मियोग राज्य फलदायक हो तो राजयोग का फल होता है और नाभासादि योग में भी रश्मियोग होने से उनका फल होता है।।३९।। योगानां फल-व्यवस्था- योगकर्त्तारमारभ्य बलिनं च विनिर्णयेत् । पूर्वभागे समुद्दिष्टभाग्यकर्मफलानि तु ।।४०।। प्रथम भाग में भाग्यादि का जो फल कहा गया है उसका शुभाशुभ फल रश्मि के अनुपात द्वारा निर्णय करना चाहिये।।४०।। अनुपातेन विज्ञाय योजयेद्वर्जयेद्बुधः । स्थानवीर्याधिके देशे मुख्यः स्यादनुपाततः ।।४१।। स्थानबल, दिग्बल, चेष्टाबल, कालबल, अयनबल, उच्चबल, नैसर्गिकबल

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४३ इनमें जो अधिक वल हो उससे उच्च रश्मि का फल कहते हैं। स्थान वल अधिक हो तो देश में मुख्य हो।।४१।। दिग्बले विजयश्रेष्टा वीर्ये तु प्रभुता भवेत् । कालवीर्योऽधिके कार्ये सदोत्साही तथायने ।।४२।। दिग्बल अधिक हो तो विजयी हो, चेष्टावल अधिक हो तो प्रभुत्व हो, कालबल अधिक हो तो सभी कार्य में कुशल हो और अयनवल अधिक हो तो सभी समय आनंद में रहे।।४२।। स्ववंशोत्कर्षता स्वोच्चे नैसर्गे जातिनिर्णयः । राशीनां च ग्रहाणां च स्वभावाः कथितामया ।।४३।। उच्चबल अधिक हो तो अपने वंश में मुख्य हों, नैसर्गिक वल अधिक हो तो अपने जाति और कर्म का विशेष प्रतिपादन करनेवाला होता है। इस प्रकार से मेषादि राशियों का और ग्रहों का स्वभाव मैंने कहा।।४३।। ये चात्र योजनीयाश्च दैवज्ञेन सुबुद्धिना ।।४४।। जो मैंने कहा है उसे यथा अवसर विद्वान् बुद्धिमान् दैवज्ञ जहां जैसा उचित हो उसकी योजना वहां वैसा करें।।४४।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे रश्मिफलाध्यायश्चतुर्थः।४ अथलोकयात्राप्रकरणम्। अष्टकवर्गरेखाणांफलम् - मूलस्थानाधिके स्थाने सभावः शुभ इष्यते । न्यूनेऽशुभः समे मातृपितृवंधूवदिष्यते ।।१।। जिस ग्रह का जिस भाव में जितनी रेखा कही गई है (अष्टकवर्गाध्याय श्लो. १९ आदि) यदि उस भाव में उससे अधिक रेखा हो तो उस भाव का फल शुभ, न्यून हो तो अशुभ और सम हो तो सम फल होता है।।१।। स्ववेश्मधर्मकर्मायलग्नैश्शुभं पतिं वदेत् । मृतिव्ययारिभिस्तेषां व्ययं हानिं पृथग्वदेत् ।।२।। २।४।९।१०।११ और लग्न ये ६ भाव अपने स्वभाव के अनुसार उत्तम फल देते हैं और ८।१२ ये दो भाव खर्च तथा हानि करने वाले होते हैं।।२।।

६४४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पूर्वभागोक्तानांराजयोगादीनां व्यवस्था- ये योगापूर्वभागे तु द्विग्रहाद्या नभादयः । राजयोगादयः सर्वे यथान्यायं प्रयोजयेत् ।।३।। पूर्व खंड में जो नाभस आदि राजयोग कहे गये हैं उनका रश्मि और अष्टक वर्ग के बलाबल के अनुसार फल कहना चाहिये।।३।। भरणीयं कुटुम्बस्य द्वितीयेन शुभाशुभे । अन्येषां चैव भावानां स्वनाम सदृशं फलम् ।।४।। दूसरे भाव से रेखा और शून्य के न्यूनाधिक के अनुसार अशुभ और शुभ फल देखकर कुटुम्ब पोषण का फल कहना चाहिये। अन्य भावों का उनके नाम के सदृश फल कहे।।४।। सूर्येणवेश्मस्थानेन पितुर्मृतिपदं वदेत् । चन्द्रेणपंचमेनैव मातुर्मृतिपदं वदेत् ।।५।। सूर्य और चतुर्थ स्थान से पिता की मृत्यु के समय का विचार करे और चन्द्रमा और पाँचवें भाव से माता के मृत्यु की समय का विचार करना चाहिये।।५।। मृत्युसमयज्ञानम् - सूर्ये चन्द्रे सपापे च तयोश्च मरणं भवेत् । तयोरंतरलिप्ताश्च शतद्वयविभाजिताः ।।६।। सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम भाव पापग्रह से युत हों तो दोनों की मृत्यु होती है। सूर्यादि और पापग्रहों का यथाक्रम से अंतर करके शेष की कला बनाकर उसमें २०० का भाग देना।।६।। अब्दादयोऽशुभस्यापि दृष्ट्या संगुणयेत्ततः । षष्ठ्या विभज्याब्दाद्याश्च तस्मात्पापेवलोत्तरे ।।७।। फल वर्षादिक होता है यदि समबल हों तो न्यूनाधिक्य में यदि सूर्य चन्द्र से पापग्रह बली हो तो उस फल को पापग्रह की दृष्टि से गुणाकर ६० से भाग देकर वर्षादि फल लाना।।७।। तदामृतिर्भवेन्यूने तद्बलेनैव वर्धयेत् । तदा मृत्युस्तयोर्मृत्युस्थाने पापग्रहे सति ।।८।। पापग्रह अल्पबली हो तो सूर्य और चन्द्रबल से पूर्वोक्त वर्षादि को गुणा कर ६० से भाग देकर लब्ध वर्षादि से फल कहना चाहिये और अष्टम भाव में पापग्रह हो तो माता पिता को अरिष्ट कहना।।८।।

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४५ त्रिकोणशोधन- अष्टकवर्ग शोधन की दो विधियाँ हैं। १. त्रिकोणशोधन, २. एकाधिपत्य शोधन। प्रथम त्रिकोण शोधन क्या है? सम्पूर्ण राशि चक्र में ४ त्रिकोण हैं। त्रिकोण से तात्पर्य प्रथम, पंचम और नवम राशि से है अतः प्रत्येक त्रिकोण की प्रथम राशि क्रमशः मेष, वृष, मिथुन और कर्क है। इसका प्रयोजन अष्टकवर्गाध्याय के श्लोक सं. ७५ में कहा हुआ है। अथ पिंडोत्पत्तिः- शोध्यावशेषं संस्थाप्य राशिमानेन वर्द्धयेत् । ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्द्धयेत् ।।९।। एकाधिपत्य शोधन करने से जो अंक जिस राशि के नीचे हों उन्हें उन-उन राशि के गुणकांकों से गुणा कर उसके नीचे रख दे इसके बाद उनका योग करने से राशि पिंड होता है। इसी प्रकार जिस राशि में जो ग्रह हो उस ग्रह के गुणकांक से एकाधिपत्य शोधन से शेष अंक को गुणा कर रख दे और सबका योग करने से ग्रहपिंड होता है। उदाहरण चक्रों में है। राशिगुणकांक- गोसिंहौ दशगुणितौ वसुभिर्मिथुनालिगौ । वणिग्मेषौ तु मुनिभिः कन्यकामकरौ शरैः शेषाः स्वमानगुणिता राशिमाना इभेक्रमात् ।।१०।। ग्रहगुणकांक- जीवारशुक्रसौम्यानां दशवसुमुनीन्द्रियैः । बुधस्य संख्या शेषाणां ग्रहंगुणयेत्पृथक् ।।११।। त्रिषुद्वयोर्वा यन्न्यूनमितरत्रसमं भवेत् । एकस्मिन् भवने शून्ये तत्रिकोणं न शोधयेत् ।।१२।। समत्वे सर्वगेहेषु सर्वं शोधयेद्बुधः । त्रिकोण के तीन राशियों में से जिस राशि की रेखा संख्या अल्प हो उसे त्रिकोण की अन्य दो राशि की संख्या में से घटाकर शेष को उसी राशि के नीचे रखे अल्प रेखा संख्या के स्थान में शून्य रखना चाहिये। यदि त्रिकोण की तीनों राशियों में से किसी एक राशि में शून्य हो तो अन्य दो राशियों के नीचे वैसी रेखा स्थापित कर दें अर्थात् उनका त्रिकोण शोधन न करे।।१२।।

६४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि त्रिकोण के तीनों राशियों की रेखायें तुल्य हों तो सभी का संशोधन करे अर्थात् तीनों के नीचे शून्य रखे। एकाधिपत्यशोधन- क्षीणेन सह चान्यस्मिन् शोधयेत् ग्रहवर्जितः ।।९३।। ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके । अनेन सह चान्यस्मिन् शोधयेद् ग्रहवर्जिते ।।९४।। फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् । उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन ।।९५।। उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् । सग्रहा ग्रहतुल्यत्वात्सर्वं संशोध्यमग्रहात् ।।९६।। एकत्र नास्ति चेत्सर्वहानिरन्यत्र कीर्त्तिताः । कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक् क्षेत्रं पृथक् फलम् ।।९७।। १—भौमादि पंचग्रहों की दो दो राशियाँ होती हैं अतः इन्हीं का एकाधिपत्य शोधन होता है जिसका नियम यह हैं— यदि दोनों राशियों में कोई ग्रह न हो तो अल्पसंख्या को अधिक संख्या में घटाकर शेष को अधिक संख्या के नीचे रख दे और अल्पसंख्या को ज्यों का त्यों रख देना चाहिये। २—यदि एक राशि में ग्रह हो और दूसरी राशि में ग्रह न हो और ग्रहहीन राशि के संख्या से ग्रहयुक्त राशि की संख्या अल्प हो तो ग्रहहीन राशि संख्या में से प्रहयुक्त राशि की संख्या को घटाकर शेष को ग्रहहीन राशि के नीचे रखना और ग्रहयुक्त राशि की संख्या वैसी ही रख देना। ३—यदि ग्रहयुक्त राशि की संख्या ग्रहहीन राशि के संख्या से अधिक हो तो ग्रहंयुक्त राशि की संख्या वैसी ही रहेगी और ग्रहहीन राशि के नीचे शून्य रखना चाहिये। ४—यदि दोनों राशि ग्रहयुक्त हों तो संशोधन नहीं करना चाहिये अर्थात् जैसे का तैसा ही रखना चाहिये। यदि दोनों राशियों में ग्रह न हो और संख्या भी तुल्य हो तो दोनों राशियों में शून्य रखना चाहिये। ५. यदि एक सग्रह हो और दूसरी राशि ग्रहहीन हो और संख्या भी समान हो तो ग्रहहीन राशि की संख्या के स्थान में शून्य और ग्रह युक्त राशि की संख्या

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४७ वैसी ही रहेगी। ६- यदि दोनों ग्रहयुक्त या ग्रहहीन हों अथवा दोनों में एक ग्रहयुक्त और ग्रहहीन हो और त्रिकोणशोधन के बाद किसी एक में शून्य संख्या हो तो दोनों में शून्य ही रहेगा। ७- कर्क और सिंह राशि के स्वामी चंद्र और सूर्य के अलग-अलग होने के कारण इनका एकाधिपत्य शोधन नहीं करना चाहिये। विशेष- त्रिकोणशोधन के उपरान्त ही उपर्युक्त ७ विकल्पों से एकाधिपत्य शोधन करना चाहिये। शेष उदाहरण चक्र से स्पष्ट है। सूर्याष्टकवर्ग शोधन।

ग्रहसू.बु. बृ.श.मं.:शु. चं.योगयोगापिंड
राशि१०१११२
रेखा
त्रि.शो.
एका.शो.
रा.गु.१०
ग्रं.गु.
चंद्राष्टकवर्गशोधन।
ग्रहचं. शु.सू.बु. बृ.श.मं.योगयोगपिंड
:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---
राशि१०१११२
रेखा
त्रि.शो.
एका.शो.
रा.गु.२४
ग्र.गु.१२१५

६४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । भौमाष्टकवर्गशोधन ।

ग्रहमं.चं.<br>शु.सू.बु.<br>बृ.श.योगपिंड
राशि१११२१०योग
रेखा३९
त्रि.शो.
एका.शो.
रा.गु.राशिपिंड
ग्र.गु.ग्र. पिंड

बुधाष्टकवर्गशोधन ।

ग्रहबु.<br>बृ.श.मं.चं.<br>श.सू.योगपिंड
राशि१०१११२योग
रेखा५४
त्रि.शो.
एका.शो.
रा.गु.१०११२४४५राशिपिंड
ग्र.गु.१५३६६४ग्र.पिं.यो.
१०९

गुर्वष्टकवर्गशोधन ।

ग्रहबु.<br>बृ.श.मं.शु.<br>चं.सू.
राशि१०१११२योग
रेखा५६
त्रि.शो.१४
ए.शो.
रा.गु.१०१८राशिपिंड
ग्र.गु.१५२०ग्र.पि.
३८

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४९ शुक्राष्टकवर्गशोधन। | ग्रह | शु. चं. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | मं. | | | शु. चं. | | | | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | | राशि | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | योग | | | रेखा | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ६ | ४ | ५२ | | | त्रि.शो. | ३ | ३ | २ | ० | ० | ० | ० | २ | १ | ३ | ३ | ० | १७ | | | ए.शो. | ० | ३ | २ | ० | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ७ | | | रा.गु. | १२ | २० | | | | | | | ११ | | | | ४३ | राशिपि. | | ग्र.गु. | १५ | ३० | | | | | | | ८ | | | | ५३ | ग्र.पिं. | | | | | | | | | | | | | | | | ९६ |

शनेरष्टकवर्गशोधन।

ग्रहश.मं.शु. चं.सू.बु. बृ.
राशि१०१११२
रेखा३९
त्रि.शो.१८
ए.शो.
रा.गु.१६२०
ग्र.गु.१०१५

लग्नाष्टकवर्गशोधन।

ग्रहमं.शु. चं.सू.बु. बृ.श.योगपिंड
राशि१०१११२
रेखा४९
त्रि.शो.१७
ए.शो.१०
रा.गु.१११६१०३२६९
ग्र.गु.२४३०२०९२

६५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । समुदायाष्टकवर्गचक्र।

राशिमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
ग्रहशु.<br>चं.सू.बु.<br>बृ.श.मं.
सू.४८
चं.४९
मं.३९
बु.५४
बृ.५६
शु.५२
श.३९
३६२९३६२४३६२३२५३३२५३०२५२८
नोट- सर्वाष्टक वर्ग में सभी अष्टवर्गों में मेषादि राशियों में कितनी-कितनी
रेखायें प्राप्त हुई हैं और उनका योग क्या हुआ लिखना चाहिये।
अष्टकवर्ग कुंडली
+-------------------------------------------------------------------+
|  (२५)११मं   \                    (३०)१०                   /  (२५)९. |
|              \                                          /           |
| (२८)१२        \                                        /     (२३)८श |
|                \--------------------------------------/             |
|                 |                                    |              |
|                 |               (२५)७                |              |
|      (३६)१      |                                    |              |
|                 |                                    |              |
|                 |------------------------------------|              |
|                /                                      \      (२६)६  |
|  .(१९)२       /                                        \            |
|              /                 (२४)सू.४                 \           |
|  शु(३६)३च   /                                            \ बु(२६)वृ५ |
+-------------------------------------------------------------------+

मातृपित्रोः मृत्युकालः। ग्रहयोगेन हानिः स्यात् वर्णाद्यं पृथक्ततः । संयोज्य सप्तभिर्हत्वा सप्तविंशति भाजिताः ॥१८४॥ एकाधिपत्य शोधन करने से राशियों के नीचे जो अंक आये हैं चाहे वे शून्य हों या रेखा हों उन्हें राशि के ध्रुवांकों से पृथक्-पृथक् गुण देना और जिस राशि में ग्रह हैं उनके अंकों को उन उन ग्रहों के ध्रुवांकों से गुणकर पृथक्-पृथक् रखकर, राशियों के गुणनफल का योग और ग्रहों के गुणनफल का योग कर दोनों को एक जगह जोड़कर सात ७ से गुणकर उसमें २७ से भाग देने से॥१८४॥

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५१ अब्दादयस्तदा देहनाशः करणदे सति । तस्मिन् पापग्रहे तस्माद्वलिन्येवं विधिःस्मृतः ॥१९॥ लब्धि माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है। यदि पापग्रह बलवान् हो पूर्वविधि से ही मृत्युकाल जानना॥१९॥ बलहीने तु तं हन्यात्सप्तभिः पंचभिर्भजेत् । आयुस्तयोः स्यात्स्थानस्य प्रदिशेदशुभे सति ॥२०॥ यदि निर्बल हो तो योग को सात से गुणकर ५ से भाग देने से जो वर्षादि वही माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है॥२०॥ मुनिभक्तं वसुघ्नं स्यान्नैवं चेन्नैतयोर्मृतिः । वक्ष्यमाणेन विधिना वदेदाह पराशरः ॥२१॥ यदि रेखाप्रद ग्रह वली हो तो पूर्व पिंड को आठ से गुणकर ७ से भाग देने ने लब्ध वर्षादिक दोनों का आयुष्य होता है। शून्य के आयुष्य से रेखा का आयुष्य अधिक हो तो मृत्यु नहीं होती है ऐसा पाराशर का मत है॥२१॥ चतुर्थभावात्सूर्याच्चआयुसाधनम् - सूर्यादायुः करौ भूपा मनवोऽर्का नवार्णवाः । वेदाक्षीणि तु लग्नस्य वक्ष्याम्यायस्तथैवतत् ॥२२॥ सूर्यादि ग्रहों के और लग्न का क्रम से आयुध्रुवांक २।१६।१४।१२।९।४।४।२ है॥२२॥ स्वोच्चे नीचे तु पातः स्याद्धरणादिविधिस्ततः। आयुस्तयोः स्यात्तौ तस्मिन् भवने तु तथा स्थितौ।।२३।। यदि उच्च में ग्रह हो तो ध्रुवांक की आयु ही स्पष्ट होती है और नीच में ग्रह हो तो अनुपात द्वारा आयु लाना चाहिये॥२३॥ ध्रुवांक द्वारा आयुर्विचारः- न कश्चित्स्थानदः स्याच्चेत्तत्काले च मृतिर्भवेत् । शुभमोगे शुभा प्रोक्ता तयोःस्याद्रश्मिसंभवः ॥२४॥ यदि वहां कोई रेखाप्रद ग्रह न हो तो उसी समय मृत्यु कहना चाहिये शुभग्रह

६५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्। के योग से उत्तम रीति से और पापग्रह अधिक हों तो दंड पातादि से मृत्यु कहना।। २४ ।। रश्मितः आयु साधनम् - अष्टभिर्गुणयेत्षड्भिर्विभज्यायुः परं भवेत् । वेश्मनि स्थानदा न स्युर्जन्मकाले स्फुटीकृताः ।।२५।। सूर्य और चतुर्थभाव के रश्मि संभव को ८ से गुणकर ६ से भाग लब्ध परम आयु होती है।।२५।। करणाद्यभावेकरणादिद्वारा भाव विचारः- कलीकृतश्च खनखैर्विभज्याब्दादयः क्रमात् । एवं शुभाशुभं ब्रूयान्मातापित्रोर्द्विजोत्तम ।। २६ ।। यदि चतुर्थभाव में रेखाप्रद ग्रह न हों तो चतुर्थ भाव का कला पिंड बनाकर उसमें २०० से भाग देने से वर्षादि आयु होती है इसंपर से माता पिता के शुभाशुभ फल को कहना।।२६।। करणस्थानदातारः पापपुण्य फलप्रदाः । पुनश्चोच्चादिषु तथा त्रिगुणाद्यास्तु पूर्ववत् ।। २७ ।। शून्य के देने वाले ग्रह पापफल देने वाले होते हैं और रेखा देने वाले ग्रह शुभफल देने वाले होते हैं। यदि ये अपने मूलत्रिकोणादि में हों तो पूर्ववत् त्रिगुणांदि फल देते हैं।।२७।। शत्रुनीचाधि शत्रूणां स्थानेष्वपि तु पूर्ववत् । राशिं हित्वा तु भावानां सर्वत्रैवं क्रिया भवेत् ।। २८ ।। जहां आयुष्य का विचार हो वहां राशि को छोड़कर अंशादि से जैसा संस्कार कहा हो वैसा करना, यह क्रिया सर्वत्र जानना।।२८।। भावानां संस्कार विशेषाद् फल विचारः- द्वितीयभावलिप्ताश्च राशिलिप्ताविभाजिताः । स्ववर्गणाहतास्तस्य खेटानां वर्गणाहताः ।।२९।। दूसरे भाव के अंशादि का कला करके उसमें दूसरे भाव की राशि के कला

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५३ से भाग देना लब्ध कलादि फल को द्वितीय भाव के ध्रुवांक से गुणाकर यदि उनमें ग्रह हो तो उसके ध्रुवांक से गुणकर।।२९।। भावरश्मिभिराहन्यात्सप्तभिश्च विभाजयेत् । मूलरश्मिसमूहेन शिष्टं हन्यात्तथैवतान् ।।३०।। उसे दूसरे भाव के स्वामी के रश्मि से गुणाकर सात से भाग देने से जो अंक प्राप्त हो वह भारणीय कुटुम्ब की संख्या और शेष को मूलरश्मि समूह से गुणकर।।३०।। इष्टानिष्टफलाभ्यां च हत्वांतरमथद्वयोः । सप्तविंशतिभिर्हत्वा सप्तभिश्च विभाजयेत् ।।३१।। गुणनफल में भाव स्वामी के इष्ट फल से गुणन करके एवं भाव स्वामी के कष्ट बलांकों से मूलरश्मि समूह को गुणन कर दोनों के अन्तर को २७ से गुण देने से कलादि फल को ७ से भाग देने से जो आवे वह स्त्रियों की संख्या होती है।।३१।। भरणीय कुटुम्बानां पुंस्त्रियस्तत्समाविदुः । राशीन् हित्वातु लग्नादि भावभागादिकान् ।।३२।। राशियों को छोड़कर लग्नादि भावों के अंशादि अलग-अलग अपने अपने स्वामियों के रश्मियों से गुणन करने से जो आवे उसे भावभागादि कहते हैं।।३२।। गुणयेद्रश्मिभिः स्वैश्च भावभागादयोविदुः । कलीकृत्य भलिप्ताभिर्विभज्याप्तं फलं ततः ।।३३।। इसका कलापिंड बनाकर दो जगह स्थापित करे उसमें राशि लिप्ता से भाग देने से जो फल प्राप्त हो उसे भावफल कहते हैं और दूसरे स्थान में १२ से भाग देने से जो फल हो उसे भाव साधन फल कहते हैं।।३३।। प्रकारांतर से भावफल साधन- सूर्यभक्तावशिष्टं तु भावानां साधनं विदुः । राशीन् हित्वा तंतो लिप्ताखनेत्रविभाजिताः ।।३४।। राशिको छोड़कर अंशादि की कला बनाकर उसमें २०० से भाग देना।।३४।।

६५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । साधनघ्ना विभक्ताश्च. वर्गणाभिः फलाहताः । उच्चादिवृद्धिहानिं च कुर्यात्तत्संख्यकाभवेत् ॥३५॥ लब्ध को पूर्व साधित भाव साधन से गुणकर अपने ध्रुवांक में भाग देना और पूर्व प्रतिपादित भाव साधन से गुण कर अपने ध्रुवांक में भाग देना पुनः इसे पूर्वसंपादित फल से गुण देने से जो संख्या प्राप्त हो वह कुटुम्बपोषण की संख्या होती है।।३५।। अष्टकवर्गफलाध्यायः । तत्रादावष्टकवर्गे विचारणीयः- आत्मभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् । मनोवृत्तिप्रसादश्च मातृचिन्तामृगांकतः ॥१॥ आत्मा, प्रभाव, शक्ति और पिता का फल सूर्य से विचार करना चाहिये मन, वृत्ति, प्रसन्नता और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिये।।१।। भ्रातृसत्वं गुणं भूमिंभौमेन च विचारयेत् । वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ॥२॥ भाई, बल, गुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिये। वाणिज्य कर्म वृत्ति का बुध से करना चाहिये।।२।। गुरुणा देहपुष्टिं च विद्यापुत्रार्थसंपदः । भृगोर्विवाहककर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ॥३॥ शरीर की पुष्टि, विद्या, पुत्र, धन संपत्ति का विचार गुरु से करना चाहिये। शुक्र से विवाह, संभोग, वाहन, वेश्या, स्त्री का विचार करना चाहिये।।३।। वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैवनिरीक्षयेत् । आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् । सर्वक्षणं च मरणं मंदेनैव निरीक्षयेत् ॥४॥ आयुष्य, जीवन, दुःख, शोक आदि का विचार शनि से करना चाहिये।।४।।