बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 644, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें६४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अनुपात द्वारा सम्राट् योग में न्यूनता समझना चाहिये। ५० से अधिक हो तो इन्द्र के समान होता है ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है।।३६।। रश्मौ विशेषफलम् - उच्चचेष्टोत्थयोगार्धगुणिताः षष्ठिभाजिताः । नरादीनां तु संख्याः स्युः स्पष्टा इत्याहपद्मभूः ।।३७।। उच्च रश्मि चेष्टा रश्मि का योग करके उसके आधे को पूर्व योग से गुण कर ६० से भाग देने से जो लब्धि हो उस संख्या के तुल्य मनुष्य घोड़ा, हाथी आदि सेवक होते हैं।।३७।। राजयोगेविशेषः- शूद्रादयः कलौ राजधर्मिणो म्लेक्षधर्मिणः । विप्राश्चेच्छ्रीधनैर्युक्ता यज्ञकर्मक्रियारताः ।।३८।। जो राजयोग कहे हैं वे कलियुग में शूद्रादि म्लेक्ष धर्मवालों को होता है। यदि यह राजयोग और उत्तम रश्मि योग ब्राह्मण को हो तो वह यज्ञादि कर्मनिष्ठ होता है और उसी पुण्य से स्वर्ग के राज्य को भोगनेवाला होता है।।३८।। विशेषः- योगरश्मिसमायोगे तदानीं तत्फलं विदुः । नाभासादिषु योगेषु राजयोगे स्थितं तु तत् ।।३९।। केवल राजयोग मात्र से ही राज्य की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु रश्मियोग राज्य फलदायक हो तो राजयोग का फल होता है और नाभासादि योग में भी रश्मियोग होने से उनका फल होता है।।३९।। योगानां फल-व्यवस्था- योगकर्त्तारमारभ्य बलिनं च विनिर्णयेत् । पूर्वभागे समुद्दिष्टभाग्यकर्मफलानि तु ।।४०।। प्रथम भाग में भाग्यादि का जो फल कहा गया है उसका शुभाशुभ फल रश्मि के अनुपात द्वारा निर्णय करना चाहिये।।४०।। अनुपातेन विज्ञाय योजयेद्वर्जयेद्बुधः । स्थानवीर्याधिके देशे मुख्यः स्यादनुपाततः ।।४१।। स्थानबल, दिग्बल, चेष्टाबल, कालबल, अयनबल, उच्चबल, नैसर्गिकबल