बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४३ इनमें जो अधिक वल हो उससे उच्च रश्मि का फल कहते हैं। स्थान वल अधिक हो तो देश में मुख्य हो।।४१।। दिग्बले विजयश्रेष्टा वीर्ये तु प्रभुता भवेत् । कालवीर्योऽधिके कार्ये सदोत्साही तथायने ।।४२।। दिग्बल अधिक हो तो विजयी हो, चेष्टावल अधिक हो तो प्रभुत्व हो, कालबल अधिक हो तो सभी कार्य में कुशल हो और अयनवल अधिक हो तो सभी समय आनंद में रहे।।४२।। स्ववंशोत्कर्षता स्वोच्चे नैसर्गे जातिनिर्णयः । राशीनां च ग्रहाणां च स्वभावाः कथितामया ।।४३।। उच्चबल अधिक हो तो अपने वंश में मुख्य हों, नैसर्गिक वल अधिक हो तो अपने जाति और कर्म का विशेष प्रतिपादन करनेवाला होता है। इस प्रकार से मेषादि राशियों का और ग्रहों का स्वभाव मैंने कहा।।४३।। ये चात्र योजनीयाश्च दैवज्ञेन सुबुद्धिना ।।४४।। जो मैंने कहा है उसे यथा अवसर विद्वान् बुद्धिमान् दैवज्ञ जहां जैसा उचित हो उसकी योजना वहां वैसा करें।।४४।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे रश्मिफलाध्यायश्चतुर्थः।४ अथलोकयात्राप्रकरणम्। अष्टकवर्गरेखाणांफलम् - मूलस्थानाधिके स्थाने सभावः शुभ इष्यते । न्यूनेऽशुभः समे मातृपितृवंधूवदिष्यते ।।१।। जिस ग्रह का जिस भाव में जितनी रेखा कही गई है (अष्टकवर्गाध्याय श्लो. १९ आदि) यदि उस भाव में उससे अधिक रेखा हो तो उस भाव का फल शुभ, न्यून हो तो अशुभ और सम हो तो सम फल होता है।।१।। स्ववेश्मधर्मकर्मायलग्नैश्शुभं पतिं वदेत् । मृतिव्ययारिभिस्तेषां व्ययं हानिं पृथग्वदेत् ।।२।। २।४।९।१०।११ और लग्न ये ६ भाव अपने स्वभाव के अनुसार उत्तम फल देते हैं और ८।१२ ये दो भाव खर्च तथा हानि करने वाले होते हैं।।२।।