भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 646, कुल 800 में से

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पृष्ठ 646

६४४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पूर्वभागोक्तानांराजयोगादीनां व्यवस्था- ये योगापूर्वभागे तु द्विग्रहाद्या नभादयः । राजयोगादयः सर्वे यथान्यायं प्रयोजयेत् ।।३।। पूर्व खंड में जो नाभस आदि राजयोग कहे गये हैं उनका रश्मि और अष्टक वर्ग के बलाबल के अनुसार फल कहना चाहिये।।३।। भरणीयं कुटुम्बस्य द्वितीयेन शुभाशुभे । अन्येषां चैव भावानां स्वनाम सदृशं फलम् ।।४।। दूसरे भाव से रेखा और शून्य के न्यूनाधिक के अनुसार अशुभ और शुभ फल देखकर कुटुम्ब पोषण का फल कहना चाहिये। अन्य भावों का उनके नाम के सदृश फल कहे।।४।। सूर्येणवेश्मस्थानेन पितुर्मृतिपदं वदेत् । चन्द्रेणपंचमेनैव मातुर्मृतिपदं वदेत् ।।५।। सूर्य और चतुर्थ स्थान से पिता की मृत्यु के समय का विचार करे और चन्द्रमा और पाँचवें भाव से माता के मृत्यु की समय का विचार करना चाहिये।।५।। मृत्युसमयज्ञानम् - सूर्ये चन्द्रे सपापे च तयोश्च मरणं भवेत् । तयोरंतरलिप्ताश्च शतद्वयविभाजिताः ।।६।। सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम भाव पापग्रह से युत हों तो दोनों की मृत्यु होती है। सूर्यादि और पापग्रहों का यथाक्रम से अंतर करके शेष की कला बनाकर उसमें २०० का भाग देना।।६।। अब्दादयोऽशुभस्यापि दृष्ट्या संगुणयेत्ततः । षष्ठ्या विभज्याब्दाद्याश्च तस्मात्पापेवलोत्तरे ।।७।। फल वर्षादिक होता है यदि समबल हों तो न्यूनाधिक्य में यदि सूर्य चन्द्र से पापग्रह बली हो तो उस फल को पापग्रह की दृष्टि से गुणाकर ६० से भाग देकर वर्षादि फल लाना।।७।। तदामृतिर्भवेन्यूने तद्बलेनैव वर्धयेत् । तदा मृत्युस्तयोर्मृत्युस्थाने पापग्रहे सति ।।८।। पापग्रह अल्पबली हो तो सूर्य और चन्द्रबल से पूर्वोक्त वर्षादि को गुणा कर ६० से भाग देकर लब्ध वर्षादि से फल कहना चाहिये और अष्टम भाव में पापग्रह हो तो माता पिता को अरिष्ट कहना।।८।।

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