बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें६६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सुतभेशनवांशैश्च तुल्या वा सन्ततिर्भवेत् । व्ययार्थसुतसंस्थैश्च पापैः स्यात्क्षीणसन्ततिः ।।३३।। पंचमेश के नवांश संख्या के तुल्य संतान की संख्या होती है। १२, २, ५ वें पापग्रह के तुल्य संतति की हानि होती है। पूर्व राशिपिंड को योगपिंड से गुणा कर २७ का या १२ का भाग देकर शेष तुल्य नक्षत्र या राशि में शनि के जाने से पुत्र को कष्ट होता है।।३३।। अथ शुक्राष्टकवर्गफलम् - भृगोरष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु । येषु येषु फलानि स्युर्भूयांसि किलतत्रतु ।।३४।। शुक्र का अष्टक वर्ग ग्रहों के साथ रखकर देखना चाहिये जहाँ जिस राशि में अधिक फल हो उस राशि पर जब शुक्र होते हैं तो जातक को।।३४।। भूमिं कलत्रं वित्तं च तद्देशे निर्दिशेन्नृणाम् । शुक्रजामित्रतो लब्धिर्दिशान्वितदिग्भवा ।।३५।। उस समय भूमि, स्त्री और धन का लाभ उस राशि के देश से प्राप्त होता है। शुक्र से सातवें स्थान की दशा अथवा सप्तमेश की दशा में स्त्री आदि का लाभ होता है।।३५।। भृगुदारेशयुक्तर्क्षफलसंख्या स्त्रियो विदुः । शुक्रान्मन्दे त्रिकोणस्थे नेष्टं जीवे सुखप्रदम् ।।३६।। शुक्र अथवा सप्तमेश के युत राशि के फल के तुल्य स्त्री की संख्या होती है। शुक्र से त्रिकोण में जब गुरु होता है तब स्त्री को सुख होता है। शेष पूर्ववत् देखना चाहिये।।३६।। अथ शनेरष्टकवर्गफलम् - शनैश्चरस्तिस्थस्थानादष्टमं मृतिरुच्यते । शनेरष्टकवर्गाच्च स्वस्यायुष्यं विनिर्दिशेत् ।।३७।। शनि से आठवां भाव मृत्यु का होता है और शनि के अष्टकवर्ग से आयु का विचार करना चाहिये।।३७।।