भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६१ लग्नात्प्रभृति मंदान्तं फलान्येकत्र कारयेत् । लग्नादिफलयोगाब्दे व्याधिबैरं समादिशेत् ।। ३८ ।। शनि के अष्टकवर्ग में लग्न से शनि पर्यन्त फलों (रेखा) का योग करना चाहिये उस योग के समान वर्ष में जातक को व्याधि और बैर का भय होता है ।। ३८ ।। मन्दादिलग्नपर्यन्तं फलान्येकत्र संयुतम् । मंदादिफलतुल्याब्दे व्याधिं तस्य समादिशेत् ।। ३९ ।। इसी प्रकार शनि से लग्न पर्यन्त फलों को एकत्र जोड़कर जो हो तत्तुल्यवर्ष में भी व्याधि भय कहना ।। ३९ ।। तयोर्योगसमाब्दे तु मृत्युयोगं समादिशेत् । शोध्यादिगुणं कृत्वा पिंडं संस्थाप्ययत्नतः ।। ४० ।। और दोनों फलों के योग तुल्य वर्ष में मृत्यु होती है। शोधनादि करने से जो पिंड आवे ।। ४० ।। अष्टमस्थफलैर्हत्वा स्वप्तविंशति भाजितम् । शतादूर्ध्वं तु तत्पिंडं शतभेवाग्रतस्त्यजेत् ।। ४१ ।। उसे अष्टमभावस्थ फल से गुणा कर २७ से भाग देने से यदि पिंड सौ से अधिक हो तो १०० को ही रखना ।। ४१ ।। आयुः पिंडं तु जानीयात्प्राग्वद्धेलांतुकल्पयेत् । त्रिकोणैकाधिपत्यर्क्ष शोधनं विरचय्य चं ।। ४२ ।। और उसी से गुणाकर २७ से भाग देने से आयु पिंड होता है इस पर से पूर्ववत् मृत्यु काल का निश्चय करना एकाधिपत्य शोधन से जो पिंड हो ।। ४२ ।। पिंडं संस्थाप्य गुणयेल्लग्नादष्टमगैः फलैः । सप्तविंशतिहृच्छेषं मृत्युकालं वदेद्बुधः ।। ४३ ।। उसे अष्टमस्थ फल से गुणाकर २७ का भाग देने से जो शेष हो उस नक्षत्र पर शनि के जाने से या उससे त्रिकोण के नक्षत्र पर जाने से मृत्यु होती है ।। ४३ ।।