भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 674

·६६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । विशेषः- मार्त्तण्डपुत्राष्टकवर्गमध्ये यद्यद्गृहे शून्यफलं भवेच्च। तत्तद्द्रमध्ये रविजेऽथ सूर्ये तदा शरीरामयपीडनंस्यात्।।४४।। शनि के अष्टकवर्ग में जिन-जिन राशियों में शून्य फल हो उन-उन राशियों में जब शनि या सूर्य जाते हैं तब-तब शरीर में रोग और कष्ट होता है।।४४।। अवस्थात्रयविचारः- मीनाद्यं मिथुनांतकं प्रथमकं प्रोक्तं वयः प्राक्तनैः । कर्काद्यं वणिजांतकं तरुणता संज्ञं च मध्यंवुधैः।।४५।। मीन राशि से मिथुन राशि पर्यन्त प्रथम अवस्था पूर्वाचार्यों ने कल्पना की है। कर्क से तुला पर्यन्त युवा अवस्था।।४५।। कुभांतं स्थविराह्वयं च बहुभिर्यत्तत्फलैः संयुतम् । तत्सौख्यार्थविशेषकं बलयुतेहित्वाव्ययाष्टकम् ।।४६।। और वृश्चिक से कुभं पर्यन्त वृद्धा अवस्था की कल्पना की है उक्त अवस्था के भावों के (सर्वाष्टक वर्ग) रेखाओं का योग करना जिस अवस्था में अधिक रेखा हो उस अवस्था में जातक को विशेष सुख होता है। किन्तु इसमें ८ वें और १२ वें भाव की रेखाओं का योग नहीं करना चाहिये।।४६।। इत्यष्टकवर्गफलम्। अथसर्वाष्टकवर्गफलम् – मेषादिभानां सकलाष्टवर्ग उत्पन्नरेखागणमेवकुर्यात् । धृत्यादि तत्त्वांतमितं कनिष्ठं त्रिंशावसानं किल मध्यवीर्याः ।।४७।। सर्वाष्टकवर्ग में मेषादि राशियों की रेखाओं का योग करना, रेखाओं का योग १८ से २५ तक हो तो कनिष्ठ फल, इसके बाद ३० तक हो तो मध्यम फल।।४७।। त्रिंशाधिकं तूत्तमवीर्यदाः स्युः शरीरसौख्यार्थयशोविशेषः ।