बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
·६६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । विशेषः- मार्त्तण्डपुत्राष्टकवर्गमध्ये यद्यद्गृहे शून्यफलं भवेच्च। तत्तद्द्रमध्ये रविजेऽथ सूर्ये तदा शरीरामयपीडनंस्यात्।।४४।। शनि के अष्टकवर्ग में जिन-जिन राशियों में शून्य फल हो उन-उन राशियों में जब शनि या सूर्य जाते हैं तब-तब शरीर में रोग और कष्ट होता है।।४४।। अवस्थात्रयविचारः- मीनाद्यं मिथुनांतकं प्रथमकं प्रोक्तं वयः प्राक्तनैः । कर्काद्यं वणिजांतकं तरुणता संज्ञं च मध्यंवुधैः।।४५।। मीन राशि से मिथुन राशि पर्यन्त प्रथम अवस्था पूर्वाचार्यों ने कल्पना की है। कर्क से तुला पर्यन्त युवा अवस्था।।४५।। कुभांतं स्थविराह्वयं च बहुभिर्यत्तत्फलैः संयुतम् । तत्सौख्यार्थविशेषकं बलयुतेहित्वाव्ययाष्टकम् ।।४६।। और वृश्चिक से कुभं पर्यन्त वृद्धा अवस्था की कल्पना की है उक्त अवस्था के भावों के (सर्वाष्टक वर्ग) रेखाओं का योग करना जिस अवस्था में अधिक रेखा हो उस अवस्था में जातक को विशेष सुख होता है। किन्तु इसमें ८ वें और १२ वें भाव की रेखाओं का योग नहीं करना चाहिये।।४६।। इत्यष्टकवर्गफलम्। अथसर्वाष्टकवर्गफलम् – मेषादिभानां सकलाष्टवर्ग उत्पन्नरेखागणमेवकुर्यात् । धृत्यादि तत्त्वांतमितं कनिष्ठं त्रिंशावसानं किल मध्यवीर्याः ।।४७।। सर्वाष्टकवर्ग में मेषादि राशियों की रेखाओं का योग करना, रेखाओं का योग १८ से २५ तक हो तो कनिष्ठ फल, इसके बाद ३० तक हो तो मध्यम फल।।४७।। त्रिंशाधिकं तूत्तमवीर्यदाः स्युः शरीरसौख्यार्थयशोविशेषः ।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६३ स्वस्वाष्टवर्गे यदि वेदहीनाः क्लेशाय सौख्यायच वेदपुष्टाः ॥४८॥ इससे अधिक हो तो उत्तम बल होता है इसमें शरीर का सुख, धन और यश का लाभ होता है। अपने-अपने अष्टक वर्ग में ४ से अल्प रेखा हो तो कष्टकारक और ४ से अधिक हो तो सुखकारक होता है।।४८।। मध्यात्फलाधिके लाभो मध्यात्क्षीणफलेव्ययः । यस्य रेखाधिकं लग्नं भोगवानर्थवान् भवेत् ॥४९॥ दशम भाव की रेखा से लाभ भाव की रेखा अधिक हो और इससे अधिक लग्न की रेखा हो तो जातक के भोगसम्पत्ति की हानि होती है। यदि दशम भाव के फल से लाभभाव की रेखायें अधिक हों और दशम भाव की रेखा से व्यय भाव की रेखा अल्प हो और लग्न की रेखायें अधिक हो तो वह जातक भोगवान् और धनी होता है।।४९।। प्रादक्षिण्यादिभानां सकलफलयुतिं दिक्चतुष्कक्रमेण कृत्वात्तद्भागतो यः समदधिकफलतः शोभनं हानिमल्पात्। सौम्यां स्वोच्चस्वगेहोदितखचरयुते दिग्विभागे स्वकार्ये वित्तेशाशासु वित्तं मृतिपतिगतदिग्भागगे देहनाशः।।५०।। लग्नादि द्वादश भावों की तीन-तीन राशियां पूर्व से दक्षिण क्रम से (सव्य गणना से) पूर्वादि दिशा कल्पना करना अर्थात् लग्न व्यय, लाभ भाव को पूर्व दिशा में, दशम, नवम, अष्टम भाव को दक्षिण दिशा में, सप्तम, षष्ठ, पंचम भाव को पश्चिम दिशा में और चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय भाव को उत्तर दिशा में कल्पना करके प्रत्येक दिशा के भावों के संपूर्ण फलों का योग करके विचार करना जिन-जिन दिशाओं में अल्पफल हो उन-उन दिशाओं में हानि होती है।।५०।। अथ भावफलम्। भावं विलोक्य सदसत्फलदायकंयत्तद्राशि संभवफलैश्च तदुक्तपिंडम् । पिंडे रेखा ताडिते भावशेषे राशौ तस्मिन्याति सौरिः समायाम् ॥५१॥
६६४ | बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । शुभ-अशुभ फल देने वाले भाव के फल को पूर्वोक्त लग्नपिंड से गुणाकर २७ का भाग देने से शेष राशि में जब शनि जाता है।।५१।। यस्यां तद्भावहानिं च विद्यात्राहूर्वशेऽथवा तत्रिकोणे । कृत्वा विन्दुभ्यस्तु कालं सुधीमांस्तस्माद्वाच्यः प्राप्तिकालः शुभत्वे ।।५२।। तब उस भाव जनित फल की हानि होती है। लग्नपिंड को भावफल से गुणाकर उसमें १२ का भाग देने से शेष राशि में जिस वर्ष शनि जाता है अथवा उसके त्रिकोण राशि में जब शनि जाता है तब उस भाव की हानि होती है।।५२।। अथ समुदायाष्टकवर्गफलम् – सर्वकर्मफलोपेते ह्यष्टवर्ग उच्यते । अन्यथा फलविज्ञानं दुर्गमं गुणदोषजम् ।।५३।। सभी कर्मों के फल के उपयुक्त अष्टकवर्ग होता है, अन्यथा फल विज्ञान दुर्गम और दोषपूर्ण होता है।।५३।। त्रिंशाधिकफलाये स्युः राशयस्ते शुभप्रदाः । त्रिंशांतं पंचविंशादि राशयो मध्यमाः स्मृताः ।।५४।। जो राशि ३० से अधिक फल वाली हैं वह शुभफलद होती है, २५ से ३० तक फलवाली मध्यम फल वाली होती है।।५४।। अतिक्षीणफला ये च राशयः कष्टदुःखदाः । श्रेष्ठराशिषु सर्वेषु शुभकार्याणि कारयेत् ।।५५।। और अत्यन्त क्षीण फल वाली जो राशि होती है वह कष्ट और दुःख देने वाली होती है। जो श्रेष्ठ फल देने वाली राशियाँ हैं उन सभी में शुभकर्मों को करना चाहिये।।५५।। श्रेष्ठात्राशीन्मुहूर्तेषु योजयेन्मतिमान्नरः । तत्तज्जन्मप्रभावास्तु पुंसस्तैः सार्धमाचरेत् ।।५६।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६५ और श्रेष्ठ राशियों को मुहूर्तों में योजित करना चाहिये।।५६।। लग्ने यावत्फलं चास्ति तद्दशायां फलं वदेत् । मूर्त्यादिव्ययपर्यन्तं दृष्ट्वा भवफलानि वै ।।५७।। लग्न में जो फल होता है वही दशा का फल होता है, लग्न से व्यय पर्यन्त प्रत्येक भाव के फल को देखे।।५७।। अधिके शोभनं विद्यात्क्षीणे हीने च मृत्यवे । मध्यमे मध्यमं चैव विचार्यैवं फलं वदेत् ।।५८।। जिस भाव का फल अधिक हो वह शुभफलदायक, न्यून अथवा शून्य फल वाले भाव कष्टकारक होते हैं और मध्यम फलवाले मध्यम होते हैं यह विचार कर फल को कहे।।५८।। मेषादियद्गृहगता वसुसंख्ययातास्तद्भाव- पुष्टिवलवृद्धिकरा भवंति । षट्पंचसप्तसहितानि शुभप्रदानि त्रिव्येक- कर्णयुतभानि न शोभनानि ।।५९।। मेषादि जिस राशि में ८ रेखा हो उस राशि के भाव का फल शुभ और वृद्धि कारक होता है। ६।५।७ रेखा से युक्त हो तो शुभप्रद होता है और ३, २, १ रेखा वाले शुभद नहीं होते हैं।।५९।। मिश्रंफलंभवतिसागरकर्णयोगे रोगापवादभयदा यदि शून्यभावाः । एकादिकर्णयुतभानुमुखग्रहाणां भिन्नाष्टवर्गजनि सर्वफलं प्रवच्मि ।।६०।। और ४ रेखा से युक्त भाव मिश्रित फल को देने वाला होता है और शून्य रेखा वाला भाव रोग कलंक और भय देने वाला होता है, यह एकादि रेखा का सूर्यादि ग्रहों का फल भिन्नाष्टक वर्ग से कहा जाता है।।६०।। रेखाशान्तिफलम् - रेखाभिः सप्तभिर्युक्ते मासे मृत्युर्भवेन्नृणाम् । सुवर्ण विंशति पलं दद्याद्वौ तिलपर्वतौ ।।६१।।
६६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । समुदायाष्टक वर्ग में जिस राशि में ७ रेखा हो उस राशि के सूर्य के मांस में मृत्युभय होता है। इसकी शान्ति के लिये २० पल सुवर्ण और दो तिल का पर्वत दान करना चाहिये॥६१॥ वसुभिर्जातिहीनः स शीघ्रं मृत्युवशो नरः । असतफल विनाशाय दद्यात्कर्पूरजां तुलाम् ॥६२॥ जिस राशि में ८ रेखा हो उस मास में जातिभ्रष्टता और मृत्युभय होता है अशुभफल के नाशार्थ कंपूर का तुलादान करना चाहिये॥६२॥ रेखाभिः नवभिः सर्पान्म्रियते मनुजो ध्रुवम् । अश्वैश्चतुभिः संयुक्तं रथं दद्यात्शुभाप्तये ॥६३॥ जिस राशि में ९ रेखा हो उस मास में सर्प से मृत्यु का भय होता है। इसकी शान्ति के लिये चार घोड़ों के रथ का दान करना चाहिये॥६३॥ रेखाभिर्दशभिः शस्त्रात्राणास्त्यजति मानवः । दद्याच्छुभफलावाप्त्यै कवचं वज्र संयुक्तम् ॥६४॥ जिस राशि में १० रेखा हो उस मास में हथियार की चोट से मृत्यु की संभावना होती है। वज्र सहित कवच का दान करना चाहिये॥६४॥ रुद्रैः प्राप्याभिशापं च प्राणैर्मुक्तोभवेन्नरः । दिक्पलैः स्वर्णघटितां प्रदद्यात्प्रतिमां विधोः ॥६५॥ जिस राशि में ११ रेखा हो किसी के शाप के कारण मृत्युभय होता है अतः शान्त्यर्थ १० भरी सुवर्ण की चन्द्रमा की मूर्त्तिदान करना चाहिये॥६५॥ आदित्यैर्जलदोषेण मानवस्य मृतिंवदेत् । भूमिं दद्यात् ब्राह्मणाय तस्माच्छुभफलंभवेत् ॥६६॥ जिस राशि में १८ रेखा हो उस मास में जलदोष से मृत्यु की संभावना होती है अतः शान्त्यर्थ ब्राह्मण को भूमि का दान करे॥६६॥ त्रयोदशमितैर्व्याघ्रान्मानवो मृत्युमाप्नुयात् । विष्णोर्हिरण्यगर्भस्य दानं कुर्याच्छुभाप्तये ॥६७॥ जिस राशि में १३ रेखा हो उस मास में व्याघ्र से मृत्यु का भय होता है अतः शान्त्यर्थ हिरण्यगर्भ (शालिग्राम) विष्णुमूर्त्ति का दान करने से शुभफल होता है॥६७॥
अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६७ अचिराज्जीवितं जहाच्छक्रैः कालेनभ क्षितः । वाराहप्रतिमां दद्यात्कनकेन विनिर्मिताम् ।।६८।। १४ रेखा हो तो थोड़े काल में अल्पायु होने का भय होता है अतः शान्त्यर्थ सुवर्ण की वराह की मूर्त्ति दान करना चाहिये।।६८।। राज्ञोभयं तिथिमितैस्तत्रहस्ती प्रदीयते । रिष्टभूपैः कल्पतरोः प्रतिमां च निवेदयेत् ।।६९।। १५ रेखा हो तो राजभय होता है अतः उसकी शान्ति के लिये हाथी का दान करना चाहिये। १६ रेखा हो तो अरिष्ट का भय होता है अतः शान्त्यर्थ कल्पतरु वृक्ष की प्रतिमा का दान करे।।६९।। ऋषिचन्द्रैर्व्याधिभयं गुड़धेतुं निवेदयेत् । कलहोऽष्टेंदुभिर्दद्याद्रत्नगोभूहिरण्यकम् ।।७०।। १७ रेखा हो तो व्याधि का भय होता है अतः शान्त्यर्थ गुड धेनु का दान करना चाहिये १८ रेखा हों तो भय होता है अतः शान्ति के लिये रत्न, गौ और भूमि का दान करना चाहिये।।७०।। देशत्यागोऽकंचन्द्रौ स्याच्छान्तिं कुर्याद्विधानतः । विंशत्या बुद्धिनाशः स्यात्कुर्याल्लक्षमितंजपम् ।।७१।। १९ रेखा हो तो देश निकाला होता है अतः शान्त्यर्थ विधानपूर्वक ग्रह शान्ति कराना चाहिये। २० रेखा हो तो बुद्धि की हानि होती है अतः शान्त्यर्थ वागीश्वरी देवी के मंत्र का एक लाख जप कराना चाहिये।।७१।। भूमिपक्षैः रोगपीडा दद्याद्धान्यस्य पर्वतम् । यमाश्विभिर्वन्धुपीडादद्यादादर्शकं बुधः ।।७२।। २१ रेखा हो तो रोग से पीड़ा होती है अतः शान्त्यर्थ धान्य का पर्वत दान देना. चाहिये।।७२।। रामपक्षयुते मासे नानाक्लेशान्प्रपद्यते । सौवर्णी प्रतिमां दद्याद्रवेः सप्तपलैः क्रमात् ।।७३।। २३ रेखा हो तो उस मास में अनेक कष्टों से युक्त होता है इसकी शान्ति के लिये ७ पल की सूर्य की प्रतिमा का दान करें।।७३।।
६६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वेदाश्विभिर्बंधुहीनो दद्याद्गोदानकं दश । सर्वरोगादि नाशार्थं जपहोमादि कारयेत् ॥७४॥ २४ रेखा हो तो बंधु हीनता का भय होता है इसकी शान्ति के लिये दश गोदान करे २५ रेखा हो तो सभी रोग आदि के नाशार्थ जप होम करावै ।।७४।। ऋतुपक्षैर्बुद्धिहीनः पूज्या वागीश्वरी तथा । धनक्षयः स्यान्नक्षत्रैः श्रीसूक्तं तत्र संजपेत् ।।७५।। २६ रेखा हो तो बुद्धि हीनता होती है इसकी शान्ति के लिये बागीश्वरी देवी का पूजन करना चाहिये। २७ रेखा हो तो धन की हानि होती है इसकी शान्ति के लिये श्रीसूक्त का जप करावै ।।७५।। वसुपक्षयुते मासे न लाभो हानिखेचरैः । सूर्यहोमश्च कर्त्तव्यः विधिना शुभकांक्षिभिः ।।७६।। २८ रेखा हो तो ग्रहों द्वारा हानि होती है। सूर्य के मंत्र से हवन कराना चाहिये ।।७६।। एकोनत्रिशता चापि चिंता व्याकुलितो भवेत् । घृतवस्त्रसुवर्णानि तत्र दद्याद्विचक्षणः ।।७७।। २९ रेखा हो तो चिंता से व्याकुलता होती है इसकी शान्ति के लिये घी वस्त्र सुवर्ण का दान करना चाहिये।।७७।। त्रिशता धनधान्याप्तिरिति जातकनिर्णयः । भूवह्निभिर्महोद्योगः पुत्रसंपद्गुणाग्निभिः ।।७८।। ३० रेखा हो तो धन धान्य का लाभ होता है। ३१ रेखा हो तो बड़े उद्योग का आरम्भ और ३३ रेखा में पुत्र संपत्ति का लाभ।।७८।। सहेमवस्त्रलाभश्च चतुस्त्रिंशत्समन्विते । पंचरामैर्भवेद्धीमान्षट्त्रिंशत्सुतवित्तदा ।।७९।। और ३४ रेखा में सुवर्ण वस्त्र का लाभ रेखा में बुद्धि की प्राचुर्यता, ३६ रेखामें पुत्र और धन का लाभ होता है।।७९।। सप्तत्रिंशद्धनस्याप्तिरष्टत्रिंशत्सुखार्थदा । द्रव्यरत्नाप्तिरेकोनचत्वारिंशद्भिर्प्रवर्धते ।।८०।।
षष्ठोऽध्यायः । ६६९ ३७ रेखा में धन का लाभ और ३८ रेखा में सुख और धन का लाभ होता है। ३९ रेखा में द्रव्य और रत्न का लाभ।।८०।। धनवान्कीर्त्तिमांश्चैव चत्वारिंशतिवर्धते । अतऊर्ध्वं यशोऽर्थाप्तिः पुण्यश्रीरूपचीयते ।।८१।। और ४० रेखा में धन और कीर्त्ति की वृद्धि होती है। इससे अधिक रेखा में यश धन, पुण्य आदि की वृद्धि होती है।।८१।। इतिपाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽष्टकवर्गप्रकरणम्। इति पाराशर होरायामुत्तरर्धेलोकयात्रा वर्णनंनाम पंचमोध्यायः।।५।। षष्ठोऽध्यायः । भाग्योत्कर्षं भाग्यहानिं कुटुम्बं दुःखं हानिं शत्रुमायं व्ययंच । उद्वाहं स्त्रीपुत्रलाभादिकं च ब्रूयादेवं चाब्दचर्या क्रमेण ।।१।। भाग्यवृद्धि भाग्यहानि, पोषणीय समूह, कष्ट, हानि, शत्रु, आय, व्यय, विवाह, स्त्री, पुत्र, लाभादिक का फल कहते हैं।।१।। अब्दमासदिनचर्याविधानं वक्ष्यते खलु मया सुमते ते । वक्ष्यमाणविधिना परमायुः सम्यगत्र विदधीत महात्मन् ।।२।। हे मैत्रेय! तुम्हें मैं वर्षचर्या, मासचर्या, दिनचर्या का विधान निश्चय कर कहता हूँ। इसके जानने के लिये सम्यक् रीति से आयु का ज्ञान आवश्यक है।।२।। भावानां फल समयः। भावानां साधनं हत्वा दृष्टिभिश्च वलेन च । षड्वर्गादिपतीनां च भावे पृथक्-पृथक् ।।३।। भावों को अपनी-अपनी दृष्टि और भाव बल से गुणा कर गुणनफल में।।३।। तेषां च दृग्वलानां च संहत्या भाजयेदथ । स्वामिदृष्टिस्थितानां तु काले भावफलं विदुः ।।४।। उन उन भावों के स्वामियों के षड्बल, दृष्टि के योग से भाग देने से लब्ध वर्षादिक में भावों के फल होते हैं।।४।।
६७० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ज्ञानसंभवकालस्तु जन्मकालाद्वला यदा । लग्नादिव्ययपर्यन्ता भावाः काले तथा विदुः ॥५॥ जो भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो और स्वामी बली हो तो उसके दशा में फल होता है। यदि अपने स्वामी से न देखा जाता हो तो उक्त समय में लग्न से व्ययपर्यन्त भावों में जो अधिक बली हो उसके स्वामी के दशा में उक्तभाव का फल होता है।।५।। अथ शुभपापभेदाद्भावफले विशेषः- लग्नाषड्वर्गहोराणां भोक्तारः पतयः स्मृताः । त्रिपंचवेददिक्सप्तमुनिरामांशके फलम् ॥६॥ लग्न में जो षड्वर्ग कहा गया है उसके (अर्थात् ६ वर्गों के स्वामी) पृथक्- पृथक् अपनी-अपनी दशा में फल को देते हैं।।६। शुभग्रहास्तुद्रष्टारः स्थानदाःसकलाग्रहाः । युक्ताः तदातु सद्भावाः संज्ञानुफलदास्तदा ।।७।। किन्तु क्रम से ३।५।३।१०।७।७ ३ अंशों में फल को देते हैं। देखने वाले शुभग्रहों का ही शुभ फल होता है पापग्रहों का नहीं होता है। रेखा में दोनों का शुभाशुभ फल होता है।।७।। पापात् हानिकरान् हित्वा स्वोच्चकोणसुहृत्स्थितान्। तद्राशिर्यस्य शत्रुंर्वा नीचयोर्वा ग्रहो यदि ।।८।। हानिं कुर्यात्तदातस्य दृष्टियोगानुपातः । भावों में जो ग्रह पाप या शुभ अपने उच्च नीच मूलत्रिकोण आदि में शत्रु मित्रादि की राशि में हों उसी क्रम से वह फल देते हैं।।८।। अथ कारक विचारः- उद्वाहकारकौ चन्द्रशुकौ ज्ञोवातपोऽथवा ।।९।। चन्द्रमा और शुक्र विवाह कारक होते हैं अथवा बुध और गुरु भी विवाह कारक होते हैं।।९।। शनिर्मृतिकरो भौमरवी नीचासतीपती । गुरुः शुभकरः पुत्रे कुजो भ्रातरि शत्रुमे ।।१०।।
षष्ठोऽध्यायः । ६७१ शनि मृत्युकारक होता है, भौम नीच (कुलटा) कारक और सूर्य सती (पतिव्रता) कारक है। पांचवे भाव में गुरु शुभ फल देने वाला होता है, भौम तीसरे स्थान में, छठें स्थान में।।१०।। मदेश्राये शुभाः सर्वे स्वोच्चगौ भौमसूर्यजौ । भाग्येऽशुभाः शुभा पापा अशुभाःस्वपतिविना ।।११।। शनि शुभफल दायक होता है और एकादश भाव में सभी शुभ फलद होते हैं, भौम शनि अपनी उच्चराशि में हो तो शुभद होता है। भाग्यभाव में पापग्रह अशुभ और शुभग्रह शुभद होता है किन्तु पापग्रह यदि उस भाव का स्वामी हो तो शुभद होता है।।११।। अथ दृष्टिबलात् भावफलस्य व्यवस्था- पूर्वभामे समुद्दिष्टदृग्बलेन फलानि तु । विरुद्धानि परित्यज्य समीचीनानि संग्रहेत् ।।१२।। पूर्वभाम में दृष्टिबल से कहे हुये फल में विरुद्ध फलों का त्यागकर शुभफलों का इस प्रकरण में उपयोग करना।।१२।। स्त्रीपुरुषयोः स्वभाव विचारः ग्रहराशिस्वभावेन पुंस्त्रियोराशिमेव च । स्वभावं च वदेद्बुध्या देशकालकुलानुगः ।।१३।। मनुष्यों के स्वभाव गुण को राशि और ग्रहों के अनुसार देशकाल और कुल के अनुसार ही कहना चाहिये।।१३।। स्वभावे ह्रासवृद्धिः। तेषामिष्टफलेवृद्धिस्त्वशुभाख्य फलादयः । अन्यथा त्वसदेवस्यात्तस्यतस्मान्मृतौफलम् ।।१४।। जिस भाव का इष्टबल अधिक हो उसका शुभफल उत्तरोत्तर अधिक और जिसका कष्टबल अधिक हो उसका अशुभ फल उत्तरोत्तर अधिक होता है।।१४।। रविस्तु पाचको ज्ञेयश्चन्द्रमा बोधकः सदा । पाचको बोधकश्चैव कारको वेधकः क्रमात् ।।१५।। सूर्य पाचक होता है और चन्द्रमा बोधक होता है और सूर्य को कारक तथा चन्द्रमा को वेधक भी कहते हैं।।१५।।
६७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्यादिग्रहाणां स्थान संबन्धात्पाचकादिग्रहाः । रव्यादीनां च विज्ञेया मंदारेज्यसितास्तथा । शुक्रारमंदरवयो रवीन्दुशनिचन्द्राजाः ।।१६।। चन्द्रेज्यसितभौमाश्च मंदारेन्दुदिनेश्वराः । भौमज्ञसूर्यमंदाः स्युः सितेन्दुगुरुभूमिजाः ।।१७।। षट्सप्तनवरुद्रेषु सप्तनंदभवत्रिषु । द्विषडायव्ययेष्वेवं द्विवेदेन्द्रियवह्निषु ।।१८।। षट्पंचसप्तरिष्फेषु द्विषड्व्ययचतुर्ष्वपि । त्रिरुद्रषट्सप्तमेषु स्थिताः स्थानेषु ते ग्रहाः ।।१९।। सूर्य से ६।७।९।११ स्थानों में क्रम से शनि, भौम, गुरु, शुक्र पाचक बोधक, कारक और वेधक होते हैं। एवं चन्द्रमा से ७।९।११।३ स्थानों में शुक्र, भौम, शनि, सूर्य, भौम से २।६।११।१२ स्थानों में सूर्य, चन्द्र, शनि, बुध से २।४।५।३ स्थानों में चन्द्र, गुरु, शुक्र, भौम, गुरु से ६।५।७।१२ स्थानों में शनि, भौम, चन्द्र, सूर्य, शुक्र से २।६।१२।४ स्थानों में भौम, बुध, सूर्य, शनि और शनि, और शनि से ३।११।६।७ स्थानों में शुक्र, चन्द्र, गुरु, भौम पाचक बोधक, कारक और वेधक होते हैं।।१६-१९।। पाचकाद्यास्तुत्वारः सूर्यादिभ्यः क्रमादिह । पीडर्क्षेवाप्यपीडर्क्षे केन्द्रे लग्नं विना तथा ।।२०।। सूर्यादि ग्रहों की शत्रुराशि, अपीडर्क्षे (मित्रराशि) में लग्न को छोड़कर केन्द्र में गये हुये सभी पाचक आदि ग्रह बली होते हैं।।२०।। षट्सप्तधर्मकर्मायमृतिष्वेव गताः क्रमात् । पाचकाद्याश्चतुर्थे च बलवंत समीरिताः ।।२१।। तथा लग्न से ६।७।९।१०।११।८।४ इन स्थानों में गये हुये सूर्यादि पाचक आदि क्रम से बली होते हैं।।२१।। कारको मंदफलदो वेधको विघ्नकृत्स्मृतः । बोधकः शीघ्रफलदः पाचको विफलप्रदः ।।२२।। कारक ग्रह न्यून फल वेधकं अपने भाव के फल की हानि करने वाला, बोधक ग्रह अपने भाव के फल को शीघ्र देने वाला तथा पाचक ग्रह अपने भाव संबंधित फल को विफल करने वाला होता है।।२२।।
अथ सप्तमोऽध्यायः । . ६७३ तदंशकालस्यांते वाप्यादावंत्यांशकेऽपि च । धृत्यांशकेऽपि फलदाः पाचकाद्याः क्रमादिह ।।२३।। ये पाचक बोधक कारक और वेधक ग्रह अन्तिम नवमांश में वा प्रथम तथा अन्तिम नवांश में भी फल देते हैं।।२३।। सूर्यादि ग्रहाणां गोचरे फलकालः। आदौ फलप्रदौ भौमरवी मध्ये सितार्यकौ । सर्वदाज्ञः शशी मंदस्त्ववसाने फलप्रदौ ।।२४।। भौम और सूर्य राशि के आदि में, शुक्र और गुरु राशि के मध्य में बुध सर्वदा और चंद्र शनि राशि के अन्त में फल देनेवाला होता है।।२४।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे लोकयात्राध्याये प्रकीर्णकाध्यायः षष्ठः।।६।। अथ सप्तमोऽध्यायः भावफलानामवधिः। धनहानिभयानां च व्याधीनां दिवसास्तथा । शुभाशुभानि कर्माणि यात्रादि विजयादि च ।।१।। धन की प्राप्ति और हानि, शत्रु भय और रोग की प्राप्ति का दिन, और शुभ अशुभ कर्म जय पराजय और उत्कर्ष इनका निर्णय।।१।। मासचर्या विधानेन ब्रूयादन्येन चैतरान् । लग्णारिमृतिरिःफेषु कर्मणां च पतींस्तथा ।।२।। मासचर्या के अनुसार करना चाहिये, इससे भिन्न कार्यों को दिन और वर्ष चर्या के अनुसार करना चाहिये। इसमें भी १।६।८।१२ भावों के स्वामी और बिन्दु के स्वामियों का विचार करना चाहिये।।२।। करणेशान्समालोच्य कथयेन्सुनिपुंगव । रंसेषवोमुनिः खाष्टो रविभूपा दिशस्तथा ।।३।। सूर्य का ५६ दिन चन्द्र का ७ दिन, भौम का ८० दिन, बुध का १२ दिन, गुरु का १६ दिन शुक्र का १० दिन।।३।। द्विशतं च क्रमात्सूर्याद्दिवासान्नाष्टमे स्थिताः । द्वितीयेऽर्धं त्वंतरे च त्रैराशिकवशेन तु ।।४।।
६७४ . वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । और शनि का २०० दिन अष्टम भाव में फल देने का समय है। दूसरे भाव में उक्त दिन संख्या का आधा और २।८ भावो को छोड़कर अन्य भावों में अनुपात द्वारा दिन संख्या ले आकर अवधि कहना चाहिये।।४।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धेलोकयात्रायाम्भावफलविवेकः सप्तमोऽध्यायः। अथाष्टमोऽध्यायः। अथयोगानां भङ्गयोगः। तेषां भंगमथो वक्ष्ये यथाह कमलासनः । गर्गाय भगवान्सोपि ममाहाहं तव द्विज ।।१।। हे मैत्रेय! पहले ब्रह्माजी ने जो योग भंग योग को गर्ग से कहा था और गर्ग ने मुझसे कहा था उसे मैं तुमसे कहता हूँ।।१।। तथा च रिःफषष्ठाष्टस्थानानां करणाधिपाः । तत्तद्भावस्य भंगस्य कर्त्तारः सति संभवे ।।२।। यदि लग्न से १२।६।८ भावों में बिन्दु देने वाले ग्रह बैठे हों या उन भावों के स्वामी के साथ बैठे हों तो भावों का भंग होता है।।२।। तत्तद्भावोऽष्टवर्गोत्थ संख्या तद्वर्गेणाहता । रविभक्ता ततः शिष्टा राशिर्मेषादिकाभवेत् ।।३।। जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के करणांक (बिन्दु संख्या) संख्या से उस भाव के वर्गेणा से गुणकर १२ का भाग देने से शेष मेषादि से राशि होती है।।३।। षष्ठाष्टारिःफे राशिश्श्चेदंग एव प्रकीर्त्तितः । फलं च मुनि संवृद्धं रविभक्तं तथा भवेत् ।।४।। यदि यह राशि ६।८।१२ भाव में हो तो भाव का भंग होता है। यहाँ १२ से भाग देने से जो लब्धांक हो उसे ७ से गुणकर उसमें १८ से भाग देने से दोष राशि होती है यदि यह राशि ६।८।१२ भाव में हो तो योग का भंग होता है।।४।। शिष्टमेवं यदि तदा शत्रुर्भं वाथ भंगदम् । तद्भावानिष्टफलकं तच्छत्रुफलसंगुणम् ।।५।। पूर्वोक्त प्रकार से आई हुई राशि यदि लग्नेश की शत्रुराशि हो वा लग्न से भंग . . युक्त हो तो उस भाव का अनिष्टफल होता है।।५।।
अथाष्टमोऽध्यायः । ६७५ सप्ताप्तं शिष्टमेवात्र पापरस्मिगुणं ततः । अर्कशिष्टं यदि भवेत्षष्ठरिःफाष्टमेऽषि वा ॥६॥ जो शेष है वह जिस भाव का भंग करता है उस भाव के कष्टफल से उसे गुणकर ७ से योग देना जो शेष रहे उसे शत्रु की राशि से गुण देना उसमें १२ से भाग देने से शेष राशि ६।८।१२ में हो तो उस भाव का भंग कहना ॥६॥ शत्रुर्भ वापिभंगक्षं हानिस्तस्य प्रकीर्त्तिताः । यथोत्तरमितीवाप्तं क्षयवृद्धिस्ततो भवेत् ॥७॥ इस प्रकार से जो भंग आता है उसके १।२।३ के क्रम से क्षय और वृद्धि जानना चाहिये ॥७॥ पुनः प्रकारांतरेण। षष्ठ्यंशे च कलांशे च त्वप्रकाशग्रहोदये । राहुकालसमायोगेतद्भावफलभंगदः ॥८॥ जिस भाव के भंग का विचार करना हो उस भाव के षष्ठ्यंश वा कलांश (षोडशांश) में अप्रकाश में से किसी एक का उदय हो तो भाव का भंगकारक योग होता है॥८॥ अनिष्टाख्यं च रश्मिं च तद्भावफलसंगुणम् । द्वादशाप्तावशेषं च पूर्ववत्फलमीरितम् ॥९॥ अथवा भाव के अरिष्टरश्मि को उस भाव के इष्टवलांक से गुणाकर के उसमें १२ का भाग देने से शेष राशि से पूर्ववत् भाव के भंग योग का विचार करना ॥९॥ यद्यत्फलं प्रोक्तमथोत्तरत्र तत्सर्वमन्यत्र योजनीयम् । भंगं च भंगं च मुनिश्च गर्गः प्रोवाचयद्वन्मुनिपुंगवाहम् ॥१०॥ मैंने जो भावभंग का विचार कहा है सो उत्तरोत्तर जहाँ जहाँ उसका उपयोग हो वहाँ वहाँ देखना, जो भंग गर्ग मुनि ने कहा है उन्हीं भंगों का लक्षण मैंने कहा है॥१०॥ षष्ठ्यंशे च कलांशे च त्रिष्वेकोऽपि यदा न चेत् । अधिमित्रं च मित्रं च भंगभंगः प्रकीर्त्तितः ॥११॥ यदि अभीष्टभाव के षष्ठ्यंश वा षोडशांश में शत्रुराशि में अप्रकाश ग्रहों का उदय, राहु समायोग इसमें से कोई भी एक न हो और अधिमित्र वा मित्र हो तो पूर्वोक्त भंग का परिहार हो जाता है॥११॥ इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे लोकयात्रायां प्रकीर्णकाध्यायः अष्टमः।
६७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ नवमोऽध्यायः । अथ भावानां संज्ञा। आत्मा शरीरं होरा च कल्पं लग्नं च मूर्तयः । स्वं कुटुम्बं च दुश्चिक्यं विक्रमं सहजं सह ॥१॥ लग्न के आत्मा, शरीर, होरा, कल्प, लग्न, मूर्ति नाम हैं। दूसरे भाव के स्वं और कुटुम्ब ये दो नाम हैं। तीसरे भाव का दुश्चिक्य, विक्रम, सहज, सह ये नाम हैं॥१॥ पातालं हिवुकं वेश्म मित्रवंधूदकं सुखम् । त्रिकोणं प्रतिभाबुद्धिमातृविद्यासुतास्ततः ॥२॥ चतुर्थभाव के पाताल, हिवुक, वेश्म, मित्र, वंधु, उदक, सुख नाम हैं, पंचम भाव के त्रिकोण, प्रतिभा, बुद्धि, मातृ; विद्या, सुत नाम हैं।।२।। व्याधिक्षतारिभंगाश्च क्रोधो लोभोऽथ मत्सर । कामो विवाहो यात्रा स्त्री रतिद्यूतं मदोऽज्ञता ॥३॥ छठे भाव के व्याधि, क्षत्र, अरि, भंग, क्रोध, लोभ, मत्सर नाम हैं। सप्तम भाव के काम, विवाह, स्त्री, रति, द्यूत, मद, अज्ञता नाम हैं।।३।। पराभवो मृतिर्वधो रंध्रायुर्निधनं च्युतिः । शुभं धर्मस्ततो भाग्यं त्रिकोणं च गुरुर्विभुः ॥४॥ अष्टम भाव के पराभव, मृति, वंध, रंध्र, आयु, निधन, च्युति नाम हैं। नवमभाव के शुभ, धर्म, भाग्य, त्रिकोण, गुरु, विभु नाम हैं।।४।। व्यापारस्पदमैषूरणमानाज्ञा कर्मखम् । भावाय लाभाप तपो रिःफं हानिव्ययःस्मृतः ॥५॥ दशमभाव के व्यापार, आस्पद मेषूरण, मान, आज्ञा, कर्म, रव, नाम हैं। एकादश भाव के आय, लाभ, अप, तप नाम हैं। व्ययभाव के रिःफ, हानि और व्यय नाम है।।५।। यात्रायां दशमेनैव निवृत्तिं सप्तमेन तु । वृद्धिश्चतुर्थलग्नेन त्रितयं संप्रकीर्तितम् ॥६॥ दशम भाव से यात्रा का विचार करना चाहिये और सातवें भाव से यात्रा में, निवृत्ति का विचार करना चाहिये। चतुर्थ से वृद्धि का विचार, इन तीनों को मिलाकर कुल ७० विषय हुये।।६।।
: अथ नवमोऽध्यायः । ६७७ स्वोच्चमित्र स्ववर्गस्था एवमर्थाश्च सप्ततिः । नीचारिवर्गाश्चान्यत्पुष्टंचापुष्टमेव च ॥७॥ यदि ग्रह मित्र, उच्च स्वक्षेत्र या षड्वर्ग में हों तो पूर्वोक्त सभी फल उत्तम होते हैं और यदि शत्रु, नीच शत्रुवर्गादि में हो तो अशुभ फल दायक होता है॥७॥ अथ ग्रहात् भाव विचारः। रविः शरीरे होरायां स्वे च भ्रातरि वेश्मनि । सुते व्याधौ क्षते शत्रौ मृतौ तपसि कर्मणि ॥८॥ सूर्य शरीर, लग्न, दूसरे भाव में तीसरे भाव में, चौथे घर में, पुत्र भाव में रोग विचार में, क्षत विचार में, मृत्यु और नवम के विचार में, कर्म के विचार में, दशम॥८॥ आये व्यये फलं दद्यात् शीतगुविक्रमे सुखे । कुटुम्बे भ्रातरिक्रोधे प्रतिभायां शुभे मृतौ ॥९॥ भाग्ये त्रिकोणे व्यापारे लाभे रिःफे फलप्रदः । आय और व्यय के विचार में फल देता है। चन्द्रमा प्रताप, कुटुम्ब, पोस्यवर्ग, भाई, क्रोध, बुद्धि, विशेषकर्म भाग्य, पंचम नवम भाव विचार और क्रयविक्रयादि और लाभ व्यय के विचार में फल देता है॥९॥ कुजः शरीरे होरायां कल्पविक्रमवंधुषु । सहजे च सहे शत्रौ क्रोधे लोभे च रंध्रके ॥१०॥ क्रियायायतौ हानौ जये भंगे फलप्रदः ॥११॥ मङ्गल से होरा कल्पशास्त्र, प्रताप, भाई, सहज, शत्रु, लोभ अष्टमभाव, कर्म, प्रभाव, हानि, उत्कर्ष और पतन का विचार करे॥१०-११॥ बुधो मनसि विद्यायां बुद्धौ हिंबुक वेश्मनि । लोभे शिल्पे च गानादिप्रिये स्वेलाभरिःफयोः ॥१२॥ बुध मानसिक विचार में विद्या, चतुर्थभाव, लोभ, शिल्प, गान-विद्या ग्यारहवे और बारहवें भाव के विचार में फल देता हैं॥१२॥ गुरुकर्मे च तपसि त्रित्रिकोणे त्रिकोणके । आज्ञायां च सुते हानौ कारागृहनिवेशने ॥१३॥ गुरु धर्म, तप नवम पंचम, आज्ञा, पुत्र, हानि, कारागार प्रवेश॥१३॥
६७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अभिशापे तथा व्याधौ स्वैकल्पे मूर्त्तिवेश्मसु । विद्याबुद्धिसुखेभावे शांत्यादिषु फलप्रदः ॥१९४॥ अभिशाप, व्याधि, रचैकल्प, मूर्त्ति, गृह, विद्या, बुद्धि, सुख, चतुर्थ भाव और शांति में फल देता है॥१९४॥ कामान्यस्त्रीविवाहेषु गीतनृत्य प्रीयादिषु । सुखे वेश्मनि दुश्चिक्ये स्वे कुटुम्बेच वेश्मनि ॥१९५॥ शुक्र से अन्य स्त्री समागम, विवाह, नृत्यगाना, सुख, गृह तृतीयभाव, धन,. द्वितीय भाव, चतुर्थभाव॥१९५॥ आज्ञा क्रियातपो भाग्ये लाभायव्ययहानिषु । वदान्यत्वे दयायां च भार्गवः फलदः सदा ॥१९६॥ आज्ञा, तप, भाग्य लाभ और हानि का विचार करना चाहिये॥१९६॥ शनिर्भतौ ध्यये रिःफे दुश्चिक्येक्षत चेतसि । सहजे च सहे भावे बंधने फलदो भवेत् ॥१९७॥ शनि से मृत्यु, व्यय तीसरे भाव, क्षत, चित्त, सहज बंधु वंधन का विचार करना चाहिये॥१९७॥ कालहोरादृकाणेशाः क्षेत्रार्कनवभागपाः । सप्तांशत्रिंशदंशेशा होरेशश्चाष्टमो भवेत् ॥१९८॥ कालहोरेश, द्रेष्काणेश, गृहेश, द्वादशांशेश, नवांशेश, सप्तमांशेश त्रिंशांशेश और होरेश ये क्रम से यथोत्तर बली होते हैं॥१९८॥ क्रमादावृत्तितः प्रोक्ता बलिष्ठः पूर्वतो यथा । सूर्यादयो ग्रहा लग्नपतिश्चावृत्तितः क्रमात् ॥१९९॥ सूर्यादि सात ग्रह और आठवां लग्न इनमें जो वली हो वही प्रथम फल देने वाला होता है॥१९९॥ इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे लोकयात्रायां नवमोऽध्यायः॥९॥ दशमोऽध्यायः । अथ आयुषः प्रकारांतराणि। वक्ष्येऽहं दायोत्थं नृणामायुः परं मुने । पैड्यो द्वादशधा प्रोक्तो ध्रुवरश्मि समुद्भवौ ॥१॥
दशमोऽध्यायः । ६७९ हे मैत्रेय! अब मैं हरण आदि से शुद्ध मनुष्यों के परम आयु को तुमसे कह हूँ। उसमें प्रथम पिंडायु है जो १२ प्रकार का है, ध्रुवायु (निसर्गायु) ४ प्रकार ।१।। अंशकाष्टकवर्गोत्थौ प्रत्येकं तु चतुर्विधम् । विषयोक्तो द्विधा प्रोक्तौ नक्षत्रांशकसंभवौ ॥२।। रश्मि से उत्पन्न आयु ४ प्रकार का, अंशोद्भव ४ प्रकार का, अष्टवर्गोद्भव कार का सब मिलकर १६ प्रकार, नक्षत्रोत्पन्न २ प्रकार और अंशोद्भव २ प्रकार कुल मिलाकर ३२ प्रकार के आयु के भेद होते हैं।।२।। अथ पिंडायुषः ध्रुवांकाः- द्वात्रिंशद्भेदभिन्नं स्यात्परमायुर्नृणामिह । अतिधृतिरर्कस्येन्दोस्तत्वानि पंचदश ।।३।। सूर्यादि ग्रह अपने परमोच्च में हों तो क्रम से सूर्य का १९, चन्द्रमा का २५, का १५, बुध का १२, गुरु का १५।।३।। द्वादशवुधस्य च गुरोस्तिथिः कवेर्मूच्छनानखाश्चार्किः । परमोच्चे च नीचेऽर्धं परेषुभावेषु वा तथा प्रोक्ताः ।।४।। शुक्र का २१ और शनि का २० पिंडायु का ध्रुवांक होता है और नीच में तो अपने २ ध्रुवांक का आधा ध्रुवांक होता है।।४।। अनुपातः कर्त्तव्यस्वंतरसंस्थेषु खेतेषु । खखभूमेः खयुग्मेंद्वो स्वांशाः पूर्ववत्कृतौ ।।५।। उक्त नीच के मध्य में ग्रहो हो तो अनुपात द्वारा फल की आना चाहिये। और ग्रहों की १०० या १२० वर्ष की परमायु होती है।।५।। नैसर्गिक रश्मिजायुषोः ध्रुवांकाः। कृतिरेको यमौ रत्नमष्टादश नखाः क्रमात् । सैकंतानमिनादीनशं दाये नैसर्गिके स्मृतम् ।।६।। सूर्यादि अपने उच्च में हों तो सूर्य का २०, चन्द्र का १, भौम का २, का ९, गुरु का १८, शुक्र का २० और शनि का ५० ध्रुवांक नैसर्गिक में है।।६।। षोडशविंशतिरेको नवाष्टनव पंचविंशतिः । षड्विंशतिस्तथोच्चे नीचेचार्द्धं रश्मौचत्विमेऽथवा ।।७।। उसी प्रकार से सूर्यादि उच्च में हो तो सूर्य का १६, चंद्र का २०, भौम
का १, बुध का ९, गुरु का ८, शुक्र का ९ और शनि का २५ या २६ रश्म्यायु में ध्रुवांक होता है। शेष क्रिया पूर्ववत् समझना ।।७।। अथध्रुवांकेभ्यो आयुसाधनप्रकारः- कलीकृतं ग्रहं व्योमखब्धिनेत्रावशेषितम् । शतद्वयेनाभिभजेद्वदमासादयः क्रमात् ।।८।। जिस ग्रह की आयु लाना हो उसके राश्यादि की कला बनाकर उसमें २४०० से भाग देकर शेष जो बचे उसमें २०० से भाग देने से वर्ष मासादि क्रम से आयु होती है।।८।। उदाहरण- सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ की कला ६५०६।३४ इसमें २४०० से भाग देने से शेष १७०६।३४ बचा इसमें २०० का भाग देने से लब्ध ८ और १०६।३४ इसमें ध्रुवांक १९ से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध १० वर्ष शेष १४।४५ इसे १२ से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध मास ० शेष १७७।१२ को ३० से गुणाकर २०० से भाग देने से २६ दिन शेष १९६।० को ६० से गुणाकर २०० से भाग देने से लब्ध २४ घटी शेष १६० को ६० से गुणाकर २०० का भाग देने से लब्ध ४८ पल प्राप्त हुआ। इस प्रकार लब्ध वर्षादि १०।०।२६।३४।४८ पूर्व लब्ध वर्ष १० में जोड़ देने से सूर्य की वर्षादि १८।०।२६।३४।४८ पिंडायु हुई। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी पिंडायु साधन करना। नवांशायुर्दायसाधनम्। सूर्यादिगुणिताच्छेषाद्वृद्धिं कुर्याद्यथोत्तरम् । स्वोच्चहीनं ग्रहं कृत्वा कर्कादिच मृगादि च ।।९।। गृहीत्वातु भुजं कोटिं कृत्वा लिप्तीकृतं तुतम् । हत्वा नवांशदायेन भजेद्भत्रयलिप्तिभिः ।।१०।। सूर्यादि ग्रहों के उच्च राश्यादि को उनमें घटाने से केन्द्र होता है। उसका भुज और कोटि करके, कोटि की कला बनाकर ध्रुवांक से गुणाकर उसमें तीन राशि की कला ५४०० से भाग देने से।।१०।। वत्सराद्या भवंत्येते वर्जयेन्मकरादिके । केन्द्रे नवांशदाये स्वे त्रिघ्ने कर्कटकादिके ।।११।। लब्ध वर्ष होता है शेष को पुनः १२ आदि से गुणाकर ५४०० से भाग देने से लब्ध मासादिक होता है। यदि मकरादि केन्द्र हो तो तीन से गुणे हुये ध्रुवांक में घटाने से और कर्कादि केन्द्र हो तो ध्रुवांक का आधा जोड़ देने से मध्यम नवांशा युदयि होता है।।११।।
दशमोऽध्यायः । ६८१ नवांशायुर्दाये विशेषः। युंज्यादर्धीकृते तस्मिन् प्रक्रमानुगतो मतः । द्विघ्ने त्वपनयेत्तस्मिन्युज्यादेव दलीकृते ।।१२।। पूर्व साधित नवांशायुर्दाय में यदि केन्द्र मकरादि ६ राशि में हो तो मूल ध्रुवांक को दूना करके उसमें घटा देना और कर्कादि ६ राशि में हो तो मूल ध्रुवांक का आधा कर उसमें जोड़ देने से आयुर्दाय होता है।।१२।। अष्टकवर्गायु साधनम्। निक्षिप्याष्टकवर्गं तु राशिचक्रे तु पूर्ववत् । त्रिकोणैकपशुद्धिं च कृत्वा तु गुणयेद्गुणैः ।।१३।। पहले अष्टक वर्ग बनाकर त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्यशोधन करके संख्या को राशि गुणाकर पिंड बनाकर।।१३।। खवन्हि भक्तभब्दाद्याः क्रमाद्भिन्नाष्टवर्गजाः । एवं कृत्वा तु संयोज्य भाप्तसमद्वादयः स्मृताः ।।१४।। उसे (पिंडको) ३० से भाग देने से भिन्नाष्टक वर्गायु होता है। पूर्वोक्त प्रकार से लाये हुये पिंड में २७ का भाग देने से वर्षादि समुदायाष्टक वर्गायु होता है।।१४।। कृत्वा करणदैरेवं स्वोत्पन्नौ दायसंज्ञितौ । प्रत्येकं भिन्नदायोत्थास्त्वैवं त्रिंशद्विदामताः ।।१५।। और इसी प्रकार से करणायु भी लाना चाहिये। पिंडायुर्दाय सप्तग्रहों के ७ प्रकार की, ध्रुवायुर्दाय सप्तग्रहों के ७ प्रकार की, रश्म्यायुर्दाय सप्तग्रहों की ७ प्रकार की, अंशायुर्दाय सप्त ग्रहों के ७ प्रकार की, रेखाष्टक वर्गोत्थ आयु १ प्रकार और करणाष्टकवर्गोत्थ आयु के ३० भेद हुये।।१५।। नवांशायुर्दाये ध्रुवाङ्काः। पंचमूर्छा सप्त रत्नं दश षोडश वारिधिः । नवांशविधितः प्रोक्ता अंत्यात्रोक्तास्तुभादितः ।।१६।। सूर्य का ५, चन्द्र का २१, भौम का ७, बुध का ९, गुरु का १०, शुक्र का १६ और शनि का ४ अंशायु साधन के ध्रुवांक हैं। प्राप्तनवांश से आरम्भ कर अनुलोम विधि से आरम्भ कर अनुलोम विधि से अंतिम नवांश पर्यन्त गणना करना चाहिये।।१६।।